यह सुखद संयोग है। एक तरफ मोहन, दूसरी तरफ माया। यह जगत इन्हीं दोनों की परमलीला का सुघड़ मंच है। युग का तेवर बदल गया है। अब दोनों अपनी-अपनी सत्ता के लिए संघर्षरत है। मोहन वैसे तो महान है, लीलामय हैं पर अहोरूपम् अहोध्वनि: की आकर्षक ध्वनि-प्रतिध्वनि के जाल में घिरे हैं। सभी आत्मरति के, आत्मसम्मोह के शिकार हैं। सबको प्रशंसा चाहिए। गणेश परिक्रमातुर चाटुकार अपने-अपने झाल-मजीरे लेकर प्रशस्तिगायन में जुटे हैं। मोहन मंडली का गुणगान ही परमभक्ति है। चतुर भक्त जानता है किस देवता को कैसे प्रसन्न करना है, वरदान और अभयदान कैसे प्राप्त करना है।
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सुबह होना जितना जरूरी है अखबार होना भी उतना ही जरूरी है। सुबह यदि अखबार नहीं तो लगता ही नहीं की सुबह हो गई। तड़के अखबार का आ जाना बड़ा सुकून देता है पढ़े भले कभी भी मगर अखबार का सुबह होना जरूरी। नेता हो, अभिनेता हो, पत्रकार, पाठक, लेखक, कलाकार, व्यापारी, उद्योगपति, मंत्री, संत्री, अफसर सब के घर सुबह का अखबार होना जरूरी। समाचारों में कुछ हो या न हो मगर अखबार की सुर्खियों के साथ चाय-पान का आनन्द ही कुछ और है और यदि अखबार में अपनी तारीफ या विरोधी के घर छापा पड़ने का समाचार हो तो क्या कहना। बाछें खिल जाती है। चेहरे पर मधुर मुस्कान छा जाती है। चिड़ियों की चहचहाट और भी मधुर लगने लग जाती है। लेकिन समय बदल गया है। अखबार बदल गये है। आप कहेंगे अखबारो में होता क्या है? हत्या, बलात्कार, चोरी, चेन खींचने की घटनाओं के अलावा।
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नेट पर लन्दन से एक लेखिका की लिखी रिपोर्ट ने वास्तव में भारतीय होने पर शर्मिंदगी का भाव पैदा किया है. उस रिपोर्ट के अनुसार लन्दन में अभी ओलम्पिक गेम होने में करीब साल भर का समय शेष है लेकिन उस आयोजन की लगभग सारी तैयारियां पूरी हो चुकी है. स्टेडियम बनकर तैयार हैं. बस अन्दर की कुछ सजावट बाकी है जो जल्दी ही पूरी कर ली जाएगी. और ये स्टेडियम इंतज़ार करेगा 1 साल ओलम्पिक के शुभारम्भ का, जिसमें पूरी दुनिया के 205 देशों के 14,700 प्रतिभागी हिस्सा लेने वाले हैं. अब इस खबर के बरक्श भारत में आयोजित हुए राष्ट्रकुल खेलों को याद कर लें. ‘अभी भी हम लन्दन के गुलाम ही हैं’ ऐसा याद दिलाने वाले इस खेल में हमने अपने महारानी के देश से ही कोई सबक नहीं लिया! इस गरीब देश का पैसा गंदे पानी की तरह बहाने के बावजूद उस खेल के नाम पर भारत में कितने ‘खेल’ हो गए यह सबको पता है.
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स्त्री वामा है, अर्धांगिनी है, श्रेष्ठा है। वह कमला भी है शक्ति भी है और दुर्गा भी है, वह कुलटा, हरजाई और भोग्या भी है। ये सारे नाम समय-समय पर उसे पुरुषों ने दिये। जब जैसा स्वार्थ जगा तब वैसी पुकार लगायी। कभी उसके सौंदर्य और शक्ति को सराहा तो कभी अपनी गलतियां छिपाने के लिए उसे दुत्कारा, लांछित भी किया। अपनी भीरुता, कापुरुषता के क्षणों में स्त्री की जरूरत पड़ी तो उसे दुर्गा कहा, अपने अहंकार को छिपाकर सामाजिक स्वीकृति के विस्तार की आकांक्षा हुई तो वामा कहा। लगाम अपने हाथ में रहे, लगातार ऐसी कोशिश की। वह भोग्या और जननी के रुप में स्वीकार की गयी पर जब कभी उसने अपने सपने की, अपनी आकांक्षाओं की बात की तो उसे दुत्कारने, दंडित करने में पुरुष को तनिक देर नहीं लगी।
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यह दुनिया है और दुनिया भी कैसी कि यहाँ आँख खोलने के बाद इन्सान रोना शुरू कर देता है... और अगर रोए नहीं तो उसको रुलाया जाता है... क्योंकि यहाँ आकर जो नहीं रोया तो वह ज़िन्दा नहीं समझा जाता... कभी हस्पताल जाकर देखा करो जब तक नया जीवन आते के साथ ही रोता नहीं है तो माता पिता के चहरे नहीं खिलते... है न कमाल... इन्सान आता है तो रोता है और जाता है तो रुलाता है... जो सत्य की खोज में रहते हैं वह तो इसी आने-जाने को लेकर चिंतन करें तो उन्हें कहीं और जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी...यह बिलकुल ऐसा ही है कि खाया पिया कुछ नहीं गिलास तोड़ा बारह आने... दुनिया में आये... इधर उधर घूमे फिरे... यहाँ वहाँ देखा.. मगर जाते समय पता चला कि कुछ देखा ही नहीं ...जो देखा था वह तो सिर्फ एक मृग तृष्णा भर है... प्यास ऐसी है कि सागर पी जाने को दिल मचलने लगे.
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दिल्ली में, जहाँ मैं रहता हूँ उसके आस-पास अंग्रेज़ी पुस्तकों की तो दर्जनों दुकाने हैं, हिंदी की एक भी नहीं। हक़ीक़त तो यह है कि दिल्ली में मुश्किल से ही हिंदी पुस्तकों की कोई दुकान मिलेगी। टाइम्स आफ इंडिया समूह के समाचार पत्र नवभारत टाइम्स की प्रसार संख्या कहीं ज़्यादा होने के बावजूद भी विज्ञापन दरें अंग्रेज़ी अख़बारों के मुकाबले अत्यंत कम हैं। इन तथ्यों के उल्लेख का एक विशेष कारण है। हिंदी दुनिया में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली पाँच भाषाओं में से एक है। जबकि भारत में बमुश्किल पाँच प्रतिशत लोग अंग्रेज़ी समझते हैं।
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मुझे जीवन में करीब पांच साल शिक्षक के रूप में काम करने का मौक़ा मिला. पहली बार 1973 में जब मैं एक डिग्री कालेज में इतिहास का मास्टर था. दो साल बाद निराश होकर वहां से भाग खड़ा हुआ. वहां बीए के बच्चों को इतिहास पढ़ाया था मैंने. वे बच्चे मेरी ही उम्र के थे. कुछ उम्र के लिहाज़ से मेरे सीनियर भी रहे होंगे. लेकिन आज तक हर साल 5 सितम्बर के दिन वे बच्चे मुझे याद करते हैं. कुछ तो टेलीफोन भी कर देते हैं. दुबारा 2005 में फिर एक बार शिक्षक बना. इस बार पत्रकारिता पढ़ाता था. तीन बैच के बच्चे मेरे विद्यार्थी हुए. यह दौर मेरे लिए बहुत उपयोगी था. पत्रकारिता का जो सैद्धांतिक पक्ष है उसके बारे में बहुत जानकारी मुझको मिली. अपने विद्यार्थियों के साथ-साथ मैं भी नई बातें सीखता रहा. तीन साल बाद नौकरी से अलग हो गया. शायद वहां मेरा काम पूरा हो चुका था. लेकिन इन वर्षों में मैं ने जिन बच्चों को पढ़ाया उन पर मुझे गर्व है.
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कारपोरेट्स घरानों को बैंकिग लाइसेंस देने का रास्ता अब साफ हो गया है। इनको लाइसेंस देने के लिए जरुरी कवायद तकरीबन छह माह से किया जा रहा था। वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में घोषणा कि थी कि चालू वित्तीय वर्ष यानी 2011-12 के अंत तक बैंकिंग लाइसेंस देने के नियमों की घोषणा कर दी जाएगी। गौरतलब है कि बैंकिंग लाइसेंस हासिल करने के लिए कारोबारी घराने लाबीइंग के जरिए सरकार को अपने पक्ष में करने की कोशिश कई सालों से कर रहे थे।इस परिप्रेक्ष्य में 29 अगस्त, 2011 को भारतीय रिजर्व बैंक ने नये बैंकिंग लाइसेंस से संबंधित मसौदे के दिशा-निर्देश को जारी किया।
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भले ही पूरा देश अण्णा के साथ हो और देशभर में इस आन्दोलन को फैलाने का जज्बा रखता हो लेकिन उघोग जगत जिसे इंडिया इंक के नाम से जाना जाता है सरदार मनमोहन की कृपा से इस बार अण्णा हजारे के साथ नहीं है। पांच माह पहले जब अण्णा ने पहली बार भूख हड़ताल की थी, तब पूरा उघोग जगत उनके साथ था, जिसे सरदार जी ने अपने दबाब में लेकर अपने साथ कर लिया। देश के दो सबसे बड़े और प्रमुख उघोग चेम्बर फिक्की और सीआईआई ने अण्णा की गिरफ्तारी पर सरकार समर्थित बयान जारी किया। ये दोनों संगठन इस वजह से भी नाराज हो गये, क्योंकि अण्णा हजारे ने 15 अगस्त के संवाददाता सम्मेलन में कई बार कहा कि यह सरकार उघोगपतियों की है और उद्योगपतियों के इशारे पर आम आदमी को नुकसान पहुंचा रही है। एक प्रमुख उद्योगपति ने कहा भी कि अण्णा का बयान 1960 और 1970 के दशक की याद दिला गया जब देश में हर गडबड़ी के लिए उघोग जगत को दोषी ठहराया जाता था।
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दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र आज ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां लोकतंत्र की मर्यादा और लोक हक सब कुछ दांव पर लगा है। किसी भी लोकतन्त्र के लिए इस से बुरा किया होगा कि लोक के द्वारा चुनी गई सरकार सर से लेकर पांव तक भ्रष्टाचार में डूबी हो, जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त हो और विपक्ष सत्ता पाने के दिव्य स्वप्न देखने में व्यस्त रहे। विपक्ष सरकार के जनविरोधी नीतियों पर घेर कर जवाब तलब करने की बजाय सरकार की दुर्दशा का जश्न मना रही है, क्योंकि उनको लगता है कि इसके बाद सत्ता उनके हाथ आने वाली है और परम आनंदित विपक्ष विरोध के नाम पर मीडिया के सामने महज शब्द वीरता दिखा रहा है। एक समय था जब विपक्ष सरकार के घोटाले को उजागर करता था और उसके बाद अखबारों की सुर्खियाँ बनती थी, लेकिन आज विपक्ष का काम मीडिया आरटीआई कार्यकर्ता व समाज सेवी संस्था करती है।
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मूर्तिपूजकों के इस समाज को एक नयी मूर्ति मिल गयी है- अन्ना हजारे. दकदक सफ़ेद कुरता-धोती पहने और सिर पर टोपी रखे अन्ना हजारे इस समय उस प्रत्येक मानवीय श्रेष्ठता की निशानी माने जा रहे हैं जो हम पूजनीय मानते हैं. वे अद्भुत हैं, वे श्रद्धेय हैं, वे महान हैं, वे परम राष्ट्रभक्त हैं, वे गज़ब के ईमानदार हैं, वे युगद्रष्टा हैं, युगप्रवर्तक और एक नए युग के रचयिया के रूप में सामने आये हैं. वे इस देश की नयी रोशनी हैं, वे इस देश और इसके देश्वासियों के नए रखवाले हैं, वे हम सभी का उद्धार करने आये हैं. उनके असीम बुद्धि और विवेक है. वे जो कुछ भी कह देते हैं वह अंतिम सत्य होता है, आदि-आदि.
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ऐसा नहीं है कि हर कोई अन्ना हजारे के आंदोलन का समर्थन कर रहा है बहुत से लोग उसका विरोध भी कर रहे हैं. मगर विरोध में कोई भी ऐसा तर्क सामने नहीं आ रहा है, जिसका समर्थन वास्तव में किया जाये. यह रहा उन तर्कों का जबाब जो आंदोलन के विरोध में दिए जा रहें हैं- पहली बात कानून बनाने का काम संसद का है और कोई भी उसको चुनौती नहीं दे सकता है:- यह तर्क सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है मगर यह सत्य नहीं है. सबसे पहली बात अगर हम संविधान को पढ़े तो उस में सबसे पहले यही लिखा है कि 'हम भारत के लोग आज २६ नवम्बर १९४९ को संविधान सभा में इस संविधान को अंगीकृत पारित एवं स्वयं को समर्पित करते हैं' इन पंक्तियों से ही स्पष्ट है कि हमारा संविधान हमारे ( भारत की जनता ) द्वारा लिखा गया है. इसमें कहीं यह नहीं लिखा है कि हम भारत के नेता या चुने हुए जनप्रतिनिधि यह संविधान बना रहे हैं. हालाँकि इसमें यह नहीं लिखा है कि जनता ही इसमें संशोधन कर सकती है ( यह अधिकार जनप्रतिनिधियों को दिया गया है. मगर उन्हें भी हम ही चुनते हैं) अतः स्पष्ट है कि जनता सर्वोच्च है न कि जनप्रतिनिधि.
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: शिवाला युद्ध के दो सौ तीस साल : घोड़े पर हौदा-हाथी पर जीन/ चुपके से भागा वारेन हेस्टिंग. यह कहावत आज भी बनारस (काशी या फिर वाराणसी के नाम से जानते हैं) क़ी गलियों में पुराने लोगों के बीच लोकप्रिय है. इसके पीछे एक कहानी है. कहते हैं कि आज से लगभग दो सौ तीस साल पहले काशी राज्य क़ी तुलना देश क़ी बड़ी रियासतों में क़ी जाती थी. भौगोलिक दृष्टिकोण से काशी राज्य भारत का ह्रदय प्रदेश था. जिसे देखते हुए उन दिनों ब्रिटिश संसद में यह बात उठाई गई थी कि यदि काशी राज्य ब्रिटिश हुकूमत के हाथ आ जाये तो उनकी अर्थ व्यवस्था तथा व्यापार का काफी विकास होगा.
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हम आजाद हैं। पूरी तरह आजाद। कुछ भी करने के लिए आजाद। कुछ भी कहने के लिए आजाद। काम करने के लिए और काम न करने के लिए भी। भद्र भाषा के इस्तेमाल के लिए और अभद्रभाषा के प्रयोग के लिए भी। रिश्वत खिलाने के लिए और रिश्वत खाने के लिए भी। हमने जब से आजादी पायी है, उसके भरपूर दोहन में लगे हैं। जो कुछ भी किया आजादी से। भ्रष्टाचार हो या अनाचार या दुराचार, हम हर मामले में आजाद हैं। हमारी जितनी समस्याएं हैं, हमें पता है, वे सभी हमारी आजादी का सुफल है। कई बार हम इसीलिए अंग्रेजों को याद करते हैं और कहते हैं कि इससे तो अच्छे वो दिन थे। एक रुपये में एक किलो घी मिलता था। पांच रुपये में घर-गृहस्थी का महीने भर का सामान आ जाता था। जिन्हें महीने के दो सौ रुपये की तनख्वाह मिलती थी, वे ठाट से जिंदगी गुजारते थे।
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कौन याद रखता है अंधेरे वक्त के साथियों को सुबह होते ही चिरागों को बुझा देते हैं। आज 10 अगस्त के बेशर्म सन्नाटे के गुजरने के बाद यह शब्द श्रद्धांजलि समर्पित है एक ऐसे जाबांज शहीद को जो नामचीन नहीं है लेकिन शहादत के रिवाज में वह अगड़ा है, पर अफसोस हमे मालूम नहीं। अपने बुड्ढ़े व लाचार मां बाप के सपनों को देश के लिए स्वाहा करने वाले मध्यम वर्गीय परिवेश के इस शहीद की शहादत की याद देश को कराना इसलिए जरूरी है कि करो या मरो के आन्दोलन में यह देश का पहला बलिदान था। पर अफसोस कि हमें मालूम नहीं कि वह भी सन 1942 की 10 अगस्त थी।
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