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चंबल के बीहड़ों में गूंजने दो बेटी की किलकारी

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मैं मध्यप्रदेश के ऐसे इलाके से ताल्लुकात रखता हूं, जो कई बातों के लिए सुविख्यात है और कुख्यात भी है। ग्वालियर का किला और यहां जन्मा ध्रुपद गायन ग्वालियर-चंबल संभाग को विश्वस्तरीय पहचान दिलाता है। वहीं मुरैना का 'पीला सोना' यानी सरसों से भी देशभर में इस बेल्ट की प्रसिद्धी है। बटेश्वर के मंदिर हों या कर्ण की जन्मस्थली कुतवार दोनों पुरातत्व और ऐतिहासिक महत्व के स्थल हैं। मुरैना पीले सोने के साथ ही राष्ट्रीय पक्षी मोरों की बहुलता के लिए भी जाना जाता है। ग्वालियर-चंबल इलाके की पहचान उसकी ब्रज, खड़ी और ठेठ लट्ठमार बोली के कारण भी है।

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विकास का कहर : शादी के लिए बिलखते गांव

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भप्तियाही चैंतीस दस का इलाका। हालाकि यह कोई आबादी वाली जगह नहीं है। कोसी नदी के पूर्वी तट पर बसे 30 झोपड़ी में कोई 100 से ज्यादा परिवारों का रहबास है यहां। एक एक झोपड़ी में चार-चार परिवारों की गुंजाइश। कोसी में समा गए बलथरबा और भुलिया गांव के लोगों का कैंप भी आप कह सकते हैं। कीचड़ भरे झोपड़ी के भीतर खाट, टूटे फुटे बर्तन, कीचड़ भरे बिछावन और जलावन के लिए कुछ लकडि़यां। इन झोपडि़यों में रह रहे लोग अपने गांवों में बड़े किसान कहलाते थे और इलाके में उनकी अपनी पूछ थी। लेकिन यहां उनकी हालत किसी भिखारियों से भी बदतर है।

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विकास की लहर से बढ़ गया कोसी का कहर, दर्जनों गांव डूबे

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‘‘बाबू जी, हम सोमालिया की दशा तो नहीं देखे हैं, लेकिन जो कुछ भी यहां हो रहा है, वह सोमालिया से भी बदतर है...।’’ यह कहना है, सुपौल-निर्मली जिले के दर्जनों गांवों के लोगों का, जो इन दिनों विस्थापन की जिंदगी बसर कर रहे हैं। इन दोनों जिले के दर्जनों गांवों के जो हालात हैं, वह सोमालिया से भी बदतर हैं। यहां दोनों जिलों को जोड़ने के लिए (नेशनल हाइवे) एनएच 57 और रेल पुल के निर्माण से बिहार में अब तक का सबसे बड़ा विस्थापन तो हुआ ही है, 70 हजार से ज्यादा लोग भुखमरी, गरीबी, अशिक्षा, बीमारी की वजह से बर्बादी के कगार पर हैं। इनका वर्तमान तो खत्म हो ही गया, भविष्य भी अधर में है। विकास के नाम पर 58 से ज्यादा गांवों को ‘जल समाधि’ दे दी गई है।

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प्रेम का संबंध सेक्‍स से ज्‍यादा मन के भाव से होता है

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कहा जाता है कि प्यार किसी जाति, धर्म, उम्र को नहीं मानता। ऐसे में घर-समाज के बीच कैसे तालमेल बैठाया जाय? प्रेम के प्रकार’ शीर्षक लेख में मैंने प्रेम के दो मुख्य भेद बताये हैं- प्राकृतिक और सामाजिक। जाति और धर्म प्राकृतिक चीज नहीं है, सामाजिक है। इसलिए केवल सामाजिक प्रेम जाति और धर्म को मानेगा जबकि प्राकृतिक प्रेम स्वभाववश इनकी बंदिशों का उल्लंघन करेगा। प्राकृतिक प्रेम की अपनी जाति होती है जो जन्म के आधार पर नहीं स्वभाव के मेल के आधार पर तय होती है। जन्म के आधार पर जो जाति समाज में प्रचलित है, वह भ्रामक है, वास्तविक जाति नहीं। उसका उपयोग समाज के धूर्त लोग अपने स्वार्थ के लिए और राजनेता वोट के लिए करते हैं।

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इतनी हिंसा यहाँ, गाँधी तुम कहाँ

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2 अक्टूबर यानि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की सालगिरह. ये दिन हर साल आता है लेकिन इस बार इसकी अहमियत कुछ ख़ास है. हाल में ही देश ने अन्ना की आंधी देखी. इस आंधी में गांधी के देश ने एक बार फिर दिखा दिया कि अहिंसा और अनशन से बड़ा दूसरा कोई हथियार ही नहीं है. जब-जब बापू के दिखाए रास्ते से इंकलाब की मशाल रोशन हुई है तब-तब दुनिया के बड़े से बड़े हुक्मरानों ने भी उसके आगे अपने घुटने टेक दिए. माना कि महात्मा गाँधी के देश में हिंसा आज एक स्थाई भाव जैसा रूप ले चुकी है. विभिन्न घटनाओं, माध्यमों, विचारों, प्रतिक्रियाओं और दृश्यों के माध्यम से हिंसा बेहद बारीक कणों के रूप में लगातार सामाजिक जीवन में बरस रही है, लेकिन जब हमारा पूरा जीवन ही क्षतिग्रस्त हो गया है और चारो तरफ घने अंधकार का आलम है तब प्रकाश का एक तिनका भी सूर्य जैसा लगता है.

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श्रद्धा व आस्था के बीच पनपी विकृतियों के खिलाफ खड़ा हुए युवा

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उत्सव हमारी संस्कृति के प्रतीक है. यह हमारी आंतरिक खुशी, प्रसन्नता की अभिव्यक्ति का माध्यम है. ये उत्सव हमें एकजुटता का संदेश देते हैं. जब बात धर्म की होती है तो फिर धर्म हमें सामाजिक तौर पर सुसंस्कृत, शिक्षित, आदर्श आचरण और श्रेष्ठ मानव बनाने का कार्य करता है. धर्म का यह स्वरूप यदि धार्मिक उत्सव में परिलक्षित होता है तो यह हमारी संस्कृति की परंपरा का निर्वहन करते हुए समाज को धर्म के प्रति आसक्त करने का बेहतर माध्यम माना जाता है. आधुनिक दौर का समावेश और समय के साथ सामाजिक बदलाव का असर दुर्भाग्यवश धार्मिक उत्सवों पर भी पड़ा है. धार्मिक उत्सवों में विकृतियों का प्रकोप नित नये स्वरूप में बढ़ता ही जा रहा है. इस प्रकोप से हमारी संस्कृति, समाज को क्षति पहुंच रही है.

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पितृ पक्ष की भारतीय अवधारणा

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अगर हम हिंदू धर्म- जिसे न्यालालय ने भी केवल एक पंथ मात्र न मान उसे एक जीवन पद्धति कहा है- की सभी मान्यताओं को मोटे तौर पर दो मुख्य बिंदुओं में समाहित करें तो वह है पुनर्जन्म में आस्था और ये मानना कि इस अखिल ब्रम्हांड, चराचर जगत का कोई नियंता है इसका विश्वास करना. शास्त्र-पुराणों से लेकर विभिन्न मिथकीय कथाओं के द्वारा भी भारतीय जीवन में यह विचार रसा-बसा है. भारतीय पद्धतियों से भी निकले अपवाद स्वरूप कुछ दर्शनों एवं विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा थोपे गए विचारों, उनके वैचारिक आक्रमणों, मुग़ल से लेकर फिरंगी गुलामियों के बावजूद सनातन धर्मावलंबियों में कभी भी इस अवधारणा के प्रति आज तक कोई अनास्था जन्म नहीं ले पाया.

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Manuvadi Threat to Indian Democracy

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In the naming of crusading against corruption, a number of supporters of the caste system, who are also vociferously opposed to reservations for the historically oppressed castes, have got together to stir up a massive agitation against India’s democratic system, insisting that democracy must bow before their dictates. In effect, what they are demanding is that the government must do as it is ordered to by them, and that if it does not do so, they will engineer mass protests which will make it difficult for any government to survive.

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एक दिन सम्मान, साल भर अपमान!

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भारत देश में शिक्षक दिवस के मौके पर केन्द्र व राज्य सरकारें बेहतर अध्यापन के लिए कई शिक्षकों का सम्मान करती है, ताकि शिक्षक और भी अच्छे ढंग से बच्चों को ज्ञान प्रदान कर सकें, लेकिन दुर्भाय है कि उस सम्मान को पाने के लिए शिक्षकों को खुद ही अपना आवेदन देना पड़ता है। शिक्षक दिवस पर मिलने वाले राष्ट्रपति और राज्यपाल सम्मान के लिए उच्चाधिकारियों के समक्ष अपनी उपलब्लियां गिनवाना शिक्षकों की मजबूरी बन गई है। अच्छे शिक्षक होने के बावजूद सोर्स के बिना सम्मानित हो पाना मुश्किल ही नहीं असंभव है। शिक्षक पूरी ईमानदारी और निष्ठा से बच्चों को पढ़ाते है, लेकिन महज एक दिन ही उनका सम्मान होता है, जबकि साल भर उन्हें कई अपमान सहने पड़ते हैं।

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आत्मा के उत्कर्ष महापर्व-पर्युषण

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: 26 अगस्‍त से 2 सितम्‍बर पर विशेष : हमारे देश में पर्वों एवं त्यौहारों की एक समृ़द्ध परम्परा रही है, यहां मनाये जाने वाले पर्व-त्योहार के पीछे कोई न कोई गौरवशाली इतिहास-संस्कृति का संबंध जुड़ा होता है। सभी धर्मों में धार्मिक भावना की दृष्टि से मनाये जाने वाले पर्व हैं जैसे-हिंदुओं में दीपावली नवरात्रि, मुसलमानों में रमजान, ईसाइयों में क्रिसमस आदि। जैन संस्कृति में जितने भी पर्व व त्योहारों मनाये जाते हैं लगभग सभी में तप एवं साधना का विशेष महत्व है। जैनों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व है पयुर्षण पर्व। यह पर्व ग्रंथियों को खोलने की सीख देता है। इस आध्यात्मिक पर्व के दौरान कोशिश यह की जाती है कि जैन कहलाने वाला हर व्यक्ति अपने जीवन को इतना मांज ले कि वर्ष भर की जो भी ज्ञात-अज्ञात त्रुटियां हुई हैं, आत्मा पर किसी तरह का मैल चढ़ा है वह सब धुल जाए।

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अन्‍ना ने देश जगाया मगर बनारस के बुद्धिजीवी सो रहे हैं

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गांधी, जेपी के बाद अब अन्ना हजारे ने देश को पूरी तरह झकझोर कर जगा दिया है। अन्ना द्वारा छेड़ी गयी भ्रष्टाचार की लड़ाई में हर तबका साथ है। हम किसी भी शहर का सर्वेक्षण करें तो वहां की सत्तर से लेकर नब्बे प्रतिशत तक जनता भावनात्मक रुप से अन्ना हजारे के साथ जुड़ी जुकी है। बनारस भी अन्ना के साथ पूरी तरह आन्दोलनरत हो चुका है। हांलाकि आन्दोलन से जुड़ने वालों में नब्बे प्रतिशत नौजवान हैं बावजूद इसके कतिपय राजनीतिक दलों को छोड़कर प्रायः सभी समाजसेवी व स्वयंसेवी संगठन जनलोकपाल व भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अन्ना का साथ देने के लिए पूरी सिद्दत के साथ जुड़े हैं।

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जनलोकपाल से खतम नहीं होगा भ्रष्‍टाचार

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: इसके लिए खुद के अंदर सुचिता और ईमानदारी लानी होगी : कारपोरेट तथा‍ निजी क्षेत्रों को क्‍यों रखा गया है जनलोकपाल से बाहर :  भ्रष्टाचार की परिभाषा :  आमतौर पर सरकारी विभागों में महज घूसखोरी को भ्रष्टाचार माना जाता है। जबकि भ्रष्टाचार का दायरा काफी व्यापक है। रिश्‍वतखोरी के अलावा यदि हम अपना काम समय से या ईमानदारी पूर्वक नहीं करते हैं तो वह भी भ्रष्टाचार है। आज भ्रष्टाचार हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है और हम सभी किसी न किसी स्तर पर इसमें भागीदार हैं।

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यह सुरक्षा का मुद्दा नहीं बल्कि व्‍यवस्‍था में कम होते विश्‍वास की है!

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23 जून 2011 को भोपाल के जिला न्यायालय में पेशी के लिये लाये गये एक अपराधी राजू खान की विनोद सिंह नामक व्यक्ति ने गोली मारकर हत्या कर दी। इस घटना के बाद से लगातार एक सप्ताह, जिला न्यायालय एवं शासन के मंत्रियों एंव अधिकारियों के बीच बैठकों की सुर्खियों में रहा। मीडिया से लेकर सभी की चिन्ता थी कि जिला न्यायालय में सुरक्षा के उपाय पर्याप्त नही हैं इसलिये यह घटना घटी। मीडिया ने यह भी याद दिलाया कि सुरक्षा के अभाव में इस प्रकार की घटना की पुनरावृत्ति हुई जबकि कई वर्ष पूर्व एक और गोलीकांड की घटना न्यायपालिका परिसर में घट चुकी थी। देखना यह होगा कि क्या ये घटनायें वास्तव में सुरक्षात्मक दृष्टिकोण से देखी जाना चाहिये या न्याय व्यवस्था की असफलता से। 23 जून को विनोद सिंह ने गोली चलाने के बाद जो बयान दिया उसमें कहा कि मुझे नहीं मालूम था कि अपराधियों की संख्या तीन थी,  नहीं तो मैं तीन गोली लेकर आता।

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लोकपाल के लिए दिनों की नहीं, महीनों के आंदोलन की जरूरत पड़ेगी

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: भीड़ के पांव होते हैं, दिमाग नहीं : जन लोकपाल बिल के लिए जो जुनून और जोश सड़कों पर दिखाई दे रहा है उसे आजादी की दूसरी लड़ाई का नाम दिया जा रहा है। अन्ना को तिहाड़ में बंद करना सरकार को भारी पड़ा। संसद से सड़क तक अन्ना को मिल रहे भारी जनसमर्थन से घबराई और बैक फुट पर आयी सरकार ने थक-हारकर अन्ना को रामलीला मैदान में 15 दिन के अनशन की अनुमति दे डाली। दरअसल मनमोहन सरकार इस मुगालते में थी कि रामदेव की तरह वो अन्ना के अनशन को भी कुचल डालेगी। लेकिन सरकार के दमनकारी नीति और नीयत ने जनभावनाओं को भड़का दिया। फलस्वरूप अन्ना के समर्थन में भारी जनसैलाब सड़कों पर उतर आया।

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जीवनदायिनी मां गंगा को मारने की कोशिश

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भारतीय संस्कृति में और जीवन-दर्शन में माँ गंगा का स्थान अनन्य है। लगभग ढाई हजार किलोमीटर में वृहद प्रक्षेत्र में प्रवाहित होती है। वह संबंधित इलाकों का तो सीधे भरण-पोषण कर रही हैं, इसके अतिरिक्त पूरे भारत के असंख्य लोगों के हृदय में प्राण-धारा बनकर प्रवाहित हो रही है। इसे दुखद कहा जायगा कि हमारी ही लापरवाही से आज गंगा की धारा कमजोर और प्रदूषित हो चली है। निश्‍चय ही गंगा के प्रति श्रद्धा का अभिव्यक्ति का सबसे सही तरीका यही होगा कि हम गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने व बचाने का दृढ़ संकल्प लें। मां गंगा का धरती पर अवतरण ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हुआ था। इस तिथि को गंगा दशहरा मनाने की परंपरा है। काशी में तो गंगा दशहरा का एक लोक-पर्व के रूप में लोकप्रिय है। इस अवसर पर कन्याएँ, गुड्डे-गुड़ियों का विवाह रचाती हैं, और उनका दीप-पुष्पादि के साथ विसर्जन कर देती हैं। वैसे तो सभी घाटों पर इसकी धूम रहती है, किन्तु दशाश्‍वमेघ घाट व पंचगंगा घाट पर विशेष गहमागहमी रहती है।

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किंगमेकर बनने की ख्‍वाइश बाबा को ले डूबी!

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चार जून शायद कम लोगों को याद रहे लेकिन कुछ तो चाह कर भी नहीं भूल पाएंगे, जो भारत की राजधानी दिल्‍ली में रामलीला मैदान में एक साधू के बहकावे में आ टपके थे, किसी के हाथ टूटे किसी के पैर कोई छुप गया तो कोई भाग गया. सत्तामठों को ब्लैक मेल करने की चाहत और राजनीति के पिछले गलियारे से इंट्री कर किंग मेकर बनने की ख्वाइश इस कदर ले डूबेगी इसका अंदाज़ा गेरुआ चोला धारक को बिलकुल नहीं था. रही बात पूरे मामले में मीडिया की भूमिका की तो भ्रष्टाचार की गंगोत्री से फूटे प्रवाह में पत्रकारिता के मानदंड या तो बह गए या किनारे लग गए जो कुछ एक बचे हैं वो इतने हताश निराश और टूट चुके हैं कि उनकी कलम अंगार उगलने के काबिल ही नहीं बची, हिम्मत दीखाने वाले पर या तो दनदनाती गोलियां चलती है या उन्हें इतना प्रताड़ित कर दिया जाता है कि सच लिखने की परिभाषा तक भूल जाता है सच को लिखने के अक्षम्य अपराध में मुंबई के एक पत्रकार की हत्या और लखनऊ के दो संवाददाताओं पर हमला जल्द ही हुआ है.

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