हिंदी भाषियों के विरोधी और मराठी नागरिकों के तथाकथित नेता राज ठाकरे गुजरात दौरे पर जा रहे हैं. इस दौरान गुजरात के विकास कार्यो पर चर्चा करेंगे और कई लोगों से मुलाकात करने वाले हैं. इस दौरान गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात भी करने वाले हैं. हम बताना चाहते हैं कि जब से राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़ कर अपनी नयी पार्टी मनसे बनाई तभी से हिंदी भाषी लोगों का विरोध करना शुरू किया है. इस से पहले जब शिवसेना में थे तब भी हिंदी भाषी पत्रकारों द्वारा हिंदी में सवाल किए जाने पर जवाब मराठी में ही देते आ रहे हैं, जब कि उन्हें हिंदी बहुत अच्छी आती है.
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सरकारी मीडिया को गरियाने का पुराना रिवाज रहा है। गाहे-बगाहे सरकारी मीडिया को गरियाने वाले लोग भले ही किसी न किसी रूप में सरकारी मीडिया से फायदा उठाते रहते हैं। वर्षों से सरकारी मीडिया के कार्यकलाप को लेकर खिंचाई होती रही है। लेकिन सरकारी बनाम निजी मीडिया की असलियत जनता जान चुकी है। वह जानती है कि कौन कितना सच खबर देता है। निजी मीडिया पर अपुष्ट खबरों के प्रकाशन व प्रसारण पर सवाल उठते रहते हैं लेकिन सरकारी मीडिया के साथ यह नौबत नहीं आती।
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पाकिस्तानी विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार 26 जुलाई को भारत दौरे पर आईं और भारतीय विदेश मंत्री एस एम कृष्णा सहित विभिन्न भारतीय नेताओं से कई दिनों तक द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की। भारतीय मीडिया ने हिना रब्बानी के इस दौरे में काफी दिलचस्पी दिखाई और विशेषकर उन्हें खासी तरजीह दी। चाहे वह प्रिंट मीडिया हो, चैनल हों या फिर इंटरनेट का न्यू मीडिया। हर जगह हिना रब्बानी छाईं रहीं। अखबारों में छपने वाले कार्टूनों में भी इन तीन दिनों उनको खूब तरजीह मिली। यही नहीं विभिन्न सोशल नेटवर्क साइटों पर भी हिना की ही चर्चा होती रही। हिना की बड़ी बड़ी तस्वीरों को अखबार के पन्नों पर जगह मिली। लेकिन अधिक चर्चा हुई हिना रब्बानी के खूबसूरती, उनके फैशन सेंस आदि को लेकर।
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साथियों आप तो सब कुछ जानते हैं आपको लेख लिखकर बताने और समझाने की जरूरत नहीं। यह लेख उन लोगों के लिए लिख रहा हूं जो पत्रकारिता से बहुत प्रभावित रहते हैं। ईमानदारी से न्याय प्रिय, कर्तव्यनिष्ठ पत्रकारिता की बात कर स्वस्थ समाज के निर्माण के समर्थक हैं। समाज की हर समस्या पर लगभग रोज समाचार प्रकाशित होते हैं। फिर भी पत्रकारों की समस्याओं को छापने के लिए अखबारों में स्थान क्यों नहीं मिलता। ग्लैमर वाली इस पत्रकारिता की दुनिया पर चर्चा करें। तो इसमें ग्रामीण पत्रकारिता उसी तरह है जिस प्रकार शहरी जीवन और ग्रामीण जीवन है। यहाँ के पत्रकारों के लिए सुविधाओं और साधनों का टोटा है। जो पत्रकारिता जगत में थोड़ी भी पहचान बनाने में कामयाब रहा वह शहर जाकर ही अपना कैरियर बनाता है। जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छे पत्रकार नहीं टिक सके।
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Saturday, 23 July 2011 14:45
विनय प्रकाश सिंह ''लल्ला''
कहिन -
मीडिया मंथन
पत्रकारिता जगत में पत्रकारों के मठाधीश छोटे पत्रकारों पर रोब गालिब करते नहीं थक रहे हैं. देखने में आ रहा है कि पत्रकार संगठन व समाचार पत्र समूह भी इन मठाधीशों के चलते अछूता भी नहीं रहे... जनपदों में समाचार पत्रों के कार्यालयों में गुटबाजी आम हो गयी है, चाहे वह बड़े समाचार पत्र हो या मझोले, सभी जगहों पर पत्रकार मठाधीश की तूती बोल रही है... यदि कोई छोटा पत्रकार इन कतिपय मठाधीशों के कहने पर नहीं चल रहा तो उसके खिलाफ मठाधीश रणनीति बनाने से नहीं चूक रहे हैं, जिस वजह से छोटे पत्रकार समाचार पत्रों के कार्यालयों में घुटन महसूस कर रहे है. वहीं समाचार समूह के जिम्मेदार लोग मठाधीशी प्रथा को समाप्त करने में अपने को असहाय महसूस कर रहे है, अगर ऐसा ही रहा तो वह दिन दूर नहीं जब समाचार पत्रों में छोटे पत्रकारों का रहना मुश्किल हो जाएगा.
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समाज में चौथा स्तंभ का दर्जा हासिल है मीडिया को। बहुत पावरफुल है मीडिया। मीडिया की आड़ में कुछ भी किया जा सकता है। खासकर ऐसा कार्य, जिसे सामान्य तरीके से अंजाम नहीं दिया जा सकता है। इसमें भले ही किसी तरह का कुकृत्य हो या दलाली। इस तरह का अवैध कार्य केवल बड़े शहरों में ही नहीं बल्कि छोटे-छोटे शहरों में भी मीडिया की आड़ में धड़ल्ले से हो रहा है। कुमाऊं का प्रमुख शहर हल्द्वानी भी इसकी चपेट में है। पिछले दिनों सहायक पुलिस अधीक्षक पी रेणुका देवी ने एक सैक्स रैकेट का पर्दाफाश किया। शहर की अच्छी-खासी आबादी वाले कॉलोनी में लंबे समय से जिस्मफरोशी का धंधा चल रहा था। जब इस धंधे में लिप्त महिला संचालक को पकड़ा तो उसने खुलेआम इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े एक पत्रकार का नाम लिया। उसने यहां तक कह डाला कि यह पत्रकार पैसा तो लेता था, साथ ही जिस्मफरोशी के धंधे में भी था। इसमें कुछ पुलिस कर्मी भी संलिप्त थे।
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ये उत्तर प्रदेश नहीं पतन प्रदेश है, इस पतन में मीडिया की हिस्सेदारी किसी भी राजनैतिक पार्टी से कहीं ज्यादा है. भ्रष्ट सरकार, अतिभ्रष्ट नौकरशाहों के इस प्रदेश में मीडिया की नयी फसल तैयार है इस फसल में आपको पत्रकार भी मिलेंगे, अखबार भी मिलेंगे और वो सभी साजो समान भी मिलेंगे, जिनसे अखबार सिर्फ और सिर्फ बाजार की चीज बनकर रह जाता है. यकीन न आये तो लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स और डेली न्यूज एक्टिविस्ट में पिछले एक सप्ताह से छापी जा रही प्रथम पेज की ख़बरों को देख लें. एक्टिविस्ट ने अपने प्रथम पृष्ठ पर विवादित और प्रदेश के महाभ्रष्ट मंत्रियों में शुमार बाबू सिंह कुशवाहा के महासचिव पद से हटाये जाने और मुख्यमंत्री द्वारा उनसे किनारा कस लेने के सम्बंध में एक खबर छापी, ठीक अगले ही दिन जनसंदेश टाइम्स ने बसपा के हवाले से इस खबर का खंडन छापा ही एक्टिविस्ट के पत्रकारिता को लाल बुझक्कड़ी करार दिया.
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मजीठिया वेज की रिपोर्ट पर देश के एक बड़े अखबार प्रतिष्ठान दैनिक जागरण का विधवा प्रलाप देखने लायक है। समूह मालिकानों के पेट में उठ रहे मरोड़ का दर्द बाहर छलकने लगा है। नंबर वन का तमगा लगाकर इतराने वाले अखबार के मालिकान सरकार से नंबर वन कैटेगरी की सुविधाएं व छूट तो लगातार बटोरते हैं पर कर्मचारियों को थर्ड क्लास का वेतन, सुविधाएं देने में इनकी नानी काहे को मरती है। दैनिक जागरण ने 21 जून को संपादकीय पेज पर मुख्य फीचर लिया है। जागरण समूह के कार्यकारी अध्यक्ष संदीप गुप्ता ने इसमें एक पक्षीय तर्क और अनाप-शनाप उदाहरण देकर न सिर्फ एक नई बहस को जन्म दिया है बल्कि अपनी दोगली नीयत को जगजाहिर भी कर दिया है।
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इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विस्तार, जल्दी ख़बरें पेश करने और दृश्यों की प्रधानता ने अख़बारों को सोचने पर मजबूर कर दिया। न्यूज़ चैनलों के मार्केट में आने से न सिर्फ़ अख़बार के पाठकों की संख्या में कमी आई बल्कि पाठकों ने उन अख़बारों को तरजीह देना शुरू कर दिया जो अपने आप में संपूर्णता परोसते हैं। उन्हें ख़बरों में भी मनोरंजन नज़र आने लगा। ऐसे में अख़बारों के सामने नई चुनौती पेश आ गई, कुछ बड़े ब्रांड ने हाथों-हाथ अपने कंटेंट में परिवर्तन कर लिया और कुछ ने मार्केट में रिसर्च कर ये पता लगाने की कोशिश की कि आख़िर सुधी पाठक इस कंपटिशन के दौर में कैसी ख़बरें पढ़ना पसंद करते हैं। ज्यादातर अख़बारों ने न सिर्फ़ अपना क्लेवर बदला बल्कि अपनी ख़बर को पेश करने का अंदाज़ भी बदल डाला, आख़िर मार्केट में जो टिके रहना था। कुछ अख़बारों ने अपनी भाषा में आम बोलचाल यानी हिंग्लिश को तरजीह दी तो किसी ने अपनी भाषा को हिंदी के साथ-साथ दूसरी भाषाओं के शब्दों को अपनाने से भी गुरेज़ नहीं किया।
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कांग्रेस मुख्यालय में जनार्दन द्विवेदी को जूता दिखाने के मामले में पुलिस, नेता और पत्रकारों की असलियत एक बार फिर उजागर हो गई। इस मामले से ही आसानी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि आज लोकतंत्र की हालत खराब क्यों है? इस मामले में किस ने क्या भूमिका निभाई और क्या निभानी चाहिए थी? पुलिस, नेता और पत्रकारों की भूमिका पर सवालिया निशान लग गया है। राजस्थान के सुनील कुमार ने पहले द्विवेदी से कोई सवाल पूछा। उसके बाद वह द्विवेदी के पास गया और जूता निकाल कर उनको दिखाने लगा। द्विवेदी इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यकत करते इसके पहले ही एक पत्रकार आगे बढ़ा उसने सुनील को पकड़ा और उसकी पिटाई करने लगा, यह देख कर कुछ और पत्रकार भी सुनील को पीटने लगे। न्यूज चैनलों में यह दिखाया गया कि सुनील को पीटने वालों में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह भी शामिल थे।
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न्यूज चैनल कितनी गलत सूचनाएं देते हैं और खबरें दिखाते हैं इसकी बानगी है हथिनी कुंड बैराज. पिछले दिनों टीवी चैनल दिखा रहे थे कि जल्द ही दिल्ली में यमुना से छोड़ा गया पानी दाखिल हो जाएगा और बाढ़ आ जाएगी. लोग डूबने लगेंगे. तमाम तरह की हवाई कल्पनाएं करने लगे थे. मैं भी खबर करने हरियाणा के हथिनीकुंड बैराज के पास स्थित जीरो ग्राउंड पर पहुंच गया. मुझे देखकर हैरानी हुई कि जैसा न्यूज चैनल चला रहे हैं वैसा वहां कुछ भी नहीं है. सब कुछ ठीक ठाक है. बाढ़ की कोई आशंका नहीं है. खबर देखकर और वास्तविक स्थिति देखकर मुझे काफी कोफ्त हुई चैनलों में मची अंधेरगर्दी पर, जो बिना सत्यता जांचे सबसे पहले खबर दिखाने के फेर में गलत सूचनाएं देकर लोगों को आतंकित करते रहते हैं.
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उत्तर प्रदेश में एक मीडिया कर्मी के साथ पुलिस की बदसलूकी ने एक बार फिर ये सवाल खड़ा कर दिया है कि सत्ता और प्रशासन वाले मीडिया के लोगों को आखिर समझते क्या हैं? ये सवाल इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि उसके बाद ही मीडिया वाले अपना बचाव कर सकते हैं. लेकिन इससे भी बड़ा सवाल मेरे नज़दीक ये है कि खुद मीडिया वाले अपने आपको क्या समझते हैं? मेरे दोनों सवालों पर ढेर सारे सवालात उठ सकते हैं. खासतौर से ऐसे समय में जब मीडिया वाले अपने ऊपर हुए हमले की निंदा करने और दोबारा ऐसी हरकत ना हो, उसे सुनिश्चित करने के लिए धरना प्रदर्शन कर रहे हैं. लेकिन इन हालात में भी सवाल उठाने का साहस मुझे मीडिया के दस वर्षों से भी ज्यादा के तजुर्बे ही ने दिया है.
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मुंबई के पत्रकार जेडे की निर्मम हत्या के कारणों को लेकर कयासों और अटकलों का दौर जारी है. मुंबई पुलिस कई एंगल से हत्याकांड की जांच कर रही है. हत्याकांड में अंडरवर्ल्ड का नाम भी सामने आ रहा है, लेकिन ये पहला मामला नहीं है जब किसी खबर को लेकर मुंबई के किसी क्राईम रिपोर्टर को निशाना बनाया गया हो. इससे पहले भी पत्रकार अपनी ख़बरों के कारण माफिया का निशाना बनते रहे हैं. मुंबई के जाबांज पत्रकार जेडे अब हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन इस जाबांज पत्रकार की निर्मम हत्या से एक बार फिर से मुंबई में क्राईम रिपोर्टर्स यानी की अपराध जगत की ख़बरें देने वाले पत्रकारों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गए हैं, लेकिन ये पहला मामला नहीं है जब मुंबई में किसी पत्रकार को माफिया ने अपना निशाना बनाया हो.
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पत्रकार हैं या कांग्रेसी रखैल गुंडे? पत्रकार है या फिर अपराधी? पत्रकार हैं या फिर दलाल? पत्रकार हैं या फिर पैरोकार हैं? कोई भी पत्रकार क्या कानून को अपने हाथ में ले सकता है और वह भी एक अपराधी के रूप में? अगर पत्रकार अपराधी की तरह कानून को अपने हाथ में लेकर मानवाधिकार हनन जैसा खेल खेलने लगे और वह भी सत्ता धारी कांग्रेस पार्टी को खुश करने के लिए तो ऐसे पत्रकारों को क्या क्या कहा जाना चाहिए? कोई एक-दो पत्रकारों ने अपनी अपराधी प्रवृति दिखायी होती तो शायद इतना बड़ा सवाल न उठता। एक दो नहीं बल्कि दर्जनों पत्रकारों ने एक साथ मिलकर क्रूरता की हदें लांघी/मानवाधिकार का गला घोटा/भारतीय दंड संहिता कानून का मखौल भी उड़ाया।
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असम और पूर्वोत्तर में कार्य कर रहे पत्रकारों की सुरक्षा पर चिंता व्यक्त करते हुए इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट के महासचिव परमानंद पांडेय ने कहा है कि असम के साथ पुर्वोत्तर के अन्य राज्यों में कार्यरत पत्रकारों की सुरक्षा के लिए यहां की सरकारों को गंभीरता से विचार करनी चाहिए। उन्होंने कहा है कि मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की सरकार को पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, छतीसगढ़ और यूपी के साथ अन्य कई राज्यों की तरह यहां के पत्रकारों के लिए पेंशन और बीमा सुरक्षा योजनाएं लागू करनी चाहिए। ताकि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की रक्षा में लगे लोगों का कल्याण हो सके।
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