वैसे जो भी उनके संपर्क में आया वो ही समझ सकता है कि वक्त के साथ बिरहा के कानफोडू होने और बिगड़ जाने की हद तक आने पर उनका काम कितना महत्वपूर्ण है. उनका काम सदा याद आयेगा. देश की कलापरक संस्थाएं ये आभास आज भी करती हैं. खैर भौतिकतावादी इस युग में कलापरक बात करना भैंस के आगे बीन बजाना लगने लगा है. इनसे अच्छा तो कुछ संस्कृतिप्रेमी मित्रों के साथ एक बैठक कर उन्हें याद कर लें,  बेहतर लगता है. वो भी बिना प्रेस नोट जारी किए. क्योंकि इस तरह के प्रेस नोट छप जाना कम आश्चर्यजनक बात नहीं है.

हमारे अपने जीवन से ही कुछ प्रमुख और जरूरी मूल्यों की बात अपने संगीतपरक कार्यक्रम के ज़रिए करने वाले राम कैलाश यादव, संगीत नाटक आकादेमी से सम्मानित, आम आदमी के गायक थे. उनके साथ पिछले दिनों आईआईटी कानपुर में स्पिक मैके के राष्ट्रीय अधिवेशन के तहत छह दिन रहने का मौक़ा मिला. जहां उनकी सेवा और उनके साथ कुछ हद तक अनौपचारिक विचार-विमर्श के साथ ही वहीं उनके गाये-सिखाए लोक गीतों पर रियाज़ के दौर बहुत याद आते हैं. अब तो वे ज्यादा गहरी यादों के साथ हमारे बीच हैं, क्योंकि वे चल बसे. आदमी के चले जाने के बाद वो ज्यादा प्यारे हो जाते हैं. ये ज़माने की फितरत भी तो है. उसी ज़माने में खुद को अलग रख पाना बहुत मुश्किल सा काम है. गांवों-गलियों और पनघट के गीत गाने वाला मिट्टी का एक लाड़ला ह्रदय गति से जुड़ी बीमारी के कारण चल बसा.

वे अपने मृत्यु के अंतिम साल में भी हमेशा की तरह भारतीय संकृति पर यथासमय भारी लगने वाली अन्य संस्कृतियों के हमले से खासे नाराज़ नज़र आते थे. कानपुर में उनका कहा एक वाक्य आज भी कचोटता है कि आज के वक्त में खाना और गाना दोनों ही खराब हो गया है. ठेठ यूपी की स्टाइल में कही जाने वाली उनकी बातें भले ही कई बार समझ में नहीं आती हों, लेकिन उनका लहजा और उस पर भी भारी उनके चहरे पर आने वाली अदाएं असरदार होती थी. धोती-कुर्ते के साथ उनके गले में एक गमछा सदैव देखा जा सकता था. उनके गाए गीतों में अधिकांशत में अपने मिट्टी की बात है या कुछ हद तक उन्होंने मानव समझ से जुड़ी बुराइयों पर खुल कर गाया बजाया है. उनके कुछ वीडियो और ऑडियो गीत नेट पर मिल जायेंगे, मगर नहीं मिल पाएगा तो राम कैलाश यादव का मुकराता चेहरा. ज्यादातर उनके गायन की शुरुआत में- ओ मोरे राम, हाय मोरे बाबा, मोरे भोले रसिया गाते सुने जाते थे. और उस पर भी भारी उनके पीछे टेर लगाकर गाते उनके साथी, जो आज उनके बगैर बहुत अधूरे लगते हैं. कोई तो उनके साथ गाते बजाते बुड्ढा तक हो गया है.

अपने सभी मिलने वालों में भगवान के दर्शन करने वाले निरंकारी भाव वाले गुरूजी के कई संगीत एलबम निकले हैं. जिनमें 1995-98 के बीच निकले सती सुलोचना, दहेज़, क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद, अभिमानी रावण ख़ास हैं. उन्होंने देशभर के लगभग सभी बड़े शहरों को अपने कार्यक्रम से नवाज़ा था. उनके साथ लोक वाद्य यंत्रों की एक पांच-छह कलावृन्द लोगों की मंडली होती रही. वे खुद खड़े होकर अपनी प्रस्तुति देते थे. बीच-बीच में कुछ अंग्रेजी डायलॉग बोलना और मूंछों पर हाथ फेरना उन पर फबता था. उनसे सीखा एक गीत आज भी याद है, जो मैं गुनगुनाता हूँ. बिरहा का कजरी में गाया जाने वाला ये एक ठेठ रंग है-

हमरे नइहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा
आवे बदरा आवे बदरा, हमरे...
जाईके  बरस बदरा वांई धोबी घटवा
जहां धोबइन भीगोई के पछारे कपड़ा
हमरे नइहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा…
जाई के  बरस बदरा वांई रे कुंवनियाँ
जहां पनिहारिन निहुरिके भरत बा घघरा
हमरे नइहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा…
जाई के बरस बदरा वांई रे महलियाँ
जहां बिरहिन निहारता पिया का डगरा
हमरे नइहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा…
जाई के बरस बदरा वांई फूल बगियाँ
जहां मलिनिया बइठके गुहत बा गजरा 
हमरे नइहर से घुमरी-घुमरी आवे बदरा…
जाई के बरस बदरा धनवा के खेतवा
जहां जोहतबा किसानिन उठाई के नजारा

उनके नहीं रहने के पांच दिन बाद ये खबर मुझे कोटा, राजस्थान के संस्कृतिकर्मी और स्पिक मैके के राष्ट्रीय सलाहकार अशोक जैन और स्पिक मैके  कार्यकर्ता वीनी कश्यप ने दी. मैं एक ही बात सोच रहा था कि इस ज़माने में कलाकार तो बहुत मिल जाते हैं, मगर सही इंसान नहीं मिल पाते. आज के दिन एक कलाकार के साथ के रूप में याद रहने वाला दिलवाला इंसान हमारे बीच नहीं रहा. उनके पांचवें बेटे कृष्ण बहादुर से बातचीत पर जाना कि गुरूजी ने अपना अंतिम सार्वजनिक कार्यक्रम स्पिक मैके आन्दोलन की पुणे शाखा के लिए एक सितम्बर को ही दिया था. वैसे सन अठ्ठासी से हार्ट-अटैक के मरीज यादव अब तक इलाहबाद से इलाज ले रहे थे. बीमारी के चलते अचानक तबियत नासाज हुई और तीन सितम्बर को उनके गाँव लमाही, जो ठेठ यूपी के हरिपुर तहसील में पड़ता है, से पास के कस्बे ले जाते रास्ते में ही मृत्यु हो गई. अब उनके पीछे छह बेटे हैं, बेटी कोई नहीं है. मगर अचरज की बात है या शोध की, उनके छह बेटों में से एक भी बिरहा नहीं गाता है. हाँ, उनके दो पोते जरुर इस काम को सीख कर आज रेडियो के ज़रिए बहुत अच्छा गा-बजा रहे हैं. प्रेमचंद और दिनेश कुमार जो पच्चीस-छब्बीस साल की उम्र लिए युवा सृजनधर्मी हैं. मतलब राम कैलाश जी यात्रा के जारी रहने के आसार हैं.

भले ही और लोगों ने बिरहा गायन को मनोरंजन के लिए खुला छोड़कर तार-तार कर दिया हो, मगर गुरु राम कैलाश जी आज तक भी अपने दम पर सतत बने हुए थे. अगर उनके नहीं रहने के बाद भी उन्हें सही श्रृद्धांजलि देनी है तो हमें अपनी रूचि में संगीत को परख कर सुनने की आदत डालनी चाहिए. राम कैलाश जी सबसे ज्यादा संगीत के इस बिगड़ते माहौल और लोक स्वरुप का बँटाधार करते कलाकारों से दु:खी थे. वैसे इस बिरहा गायन की परम्परा को देशभर में बहुत से अन्य कलाकार भी यथासम्भव आगे बढ़ा रहे हैं, मगर उनकी अपने सीमाएं और विचारधारा हैं. ऐसे में ज्ञान प्रकाश तिपानिया, बालेश्वर यादव, विजय लाल यादव भी इस क्षेत्र से जुड़े कुछ ख़ास नाम हैं. ये यात्रा तो आगे बढ़ेगी ही, मगर दिशा क्या होगी, भगवान जाने.

सारांशत: कुछ भी कहें, उस प्रखर सृजनधर्मी की गहन तपस्या का कोई सानी नहीं है. एक बात गौरतलब है कि जितने बड़े तपस्वी गुजरे हैं. उनके बाद हुई खाली जगह यूं ही खाली पडी रही. बात चाहे उस्ताद बिस्मिलाह खान की हो या हबीब तनवीर की, कोमल कोठारी की हो या फिर एमएस सुब्बुलक्ष्मी की, बात सोलह आने सच है.

लेखक माणिक चित्‍तौड़गढ़ में संस्‍कृतिकर्मी तथा 'अपनी माटी' के संपादक हैं.

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