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फिर पढ़ी जाएगी हिंदी की बदहाली पर मर्सिया

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औपचारिक समारोह का प्रतीक बनकर रह गया है-हिन्दी दिवस, यानी चौदह सितम्बर का दिन। सरकारी संस्थानों में इस दिन हिन्दी की बदहाली पर मर्सिया पढ़ने के लिए एक झूठ-मूठ की दिखावे वाली सक्रियता आती है। एक बार फिर वही ताम-झाम वाली प्रक्रिया बड़ी बेशर्मी के साथ दुहरायी जाती है। दिखावा करने में कोई पीछे नहीं रहना चाहता है। कहीं ‘हिन्दी दिवस’ मनता है, कहीं ‘सप्ताह’ तो कहीं ‘पखवाड़ा’। भाषा के पंडित, राजनीतिज्ञ, बुद्विजीवी, नौकरशाह और लेखक सभी बढ़-चढ़कर इस समारोह में शामिल होकर भाषणबाजी करते हैं। मनोरंजन के लिए कवि सम्मेलन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। पर्व-त्यौहार की तरह लोग इस दिवस को मनाते हैं।

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निराशा के दौर में उम्मीद के सपने : राजनीतिक शून्‍यता की उपज है अन्‍ना आंदोलन

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'यह आधी जीत है, आधी बाकी है। अनशन अभी स्थगित हुआ है, छूटा नहीं है।'  मतलब साफ है। न अन्ना जीते हैं और न भ्रष्टाचार हारा है। लड़ाई जारी रहेगी। यह पड़ाव है। अभी जन लोकपाल के मात्र तीन बिन्दुओं के प्रस्ताव को संसद ने पारित किया है, वह भी आंदोलन के दबाव से। स्टैण्डिंग कमेटी क्या रुख लेती है, यह आगे की बात होगी। अन्ना की आगे की राह आसान नहीं। पटाखे फोड़ने और जश्न मनाने का आह्वान है। पर इससे ज्यादा जरूरी है आगे की तैयारी हो। उस झोल पर भी बात होगी जो जन लोकपाल में है तथा इस आंदोलन में भी देखा गया है। जिनने जन लोकपाल में एनजीओ तथा निजी व कॉरपोरेट जगत को इसकी परिधि में लाने का मुद्दा उठाया है, अब उनके लिए इन मुद्दों पर मुहिम छेड़ने की बारी है।

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विदेशी पूंजी से मच रही है तबाही, रोजगार हो रहा गायब

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नयी आर्थिक नीति, जिसका भूमंडलीकरण और उदारीकरण के नाम से प्रचार हो रहा है, की घोषणा करते हुए कहा गया था कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारत में आने से नये-नये कल करखाने लगेंगे तथा बड़े पैमाने पर रोजगार के द्वार खुलेंगे। वर्तमान प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह इस नीति के ध्वजवाहक रहे हैं, परन्तु वास्तविकता यह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में कल कारखाने लगाने में कोई रूचि नहीं है। शुरू में वे यहां के पहले से लगे भारतीय उद्योगों में भागीदारी तथा बाद में एकाधिकार प्राप्त करने के लिए कार्य करते हैं। इस प्रक्रिया में नये रोजगाकर पैदा होने की कोई गुंजाइश ही नहीं है।

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प्रमोशन की रेस में हार रहे जिंदगी की दौड़

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यूपी में प्रमोशन पाकर सब इंस्पेक्टर बनने के लिए होने वाली शारीरिक क्षमता परीक्षा (फिजिकल फिटनेस टेस्ट) पुलिसकर्मियों पर लगातार भारी पड़ रही है। प्रमोशन की ललक में जिस तरह एक-एक करके पुलिसकर्मी बेहोश हो रहे हैं और अपनी जान गंवा रहे हैं, वो सोचने को मजबूर करता है। प्रमोशन की रेस में जिंदगी की रेस को दांव पर लगा रहे पुलिसकर्मियों की मौत असल में पुलिस मकहमे की कार्यप्रणाली, लचर ट्रेनिंग इंतजाम और अस्त-व्यस्त डयूटी के बोझ तले दबे फिजीकली अनफिट पुलिसकर्मियों की तस्वीर पेश करती है। देश के लगभग हर राज्य पुलिस फिजीकली अनफिट पुलिसकर्मियों और अफसरों से जूझ रही है।

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चुनावी बरसात के गोपाल मेढ़क

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शिवाशंकर रिमझिम हल्की बारिश के बीच गॉंव की बैठकी में सवाल दर सवाल उठाए जा रहे थे। जवाब पूरी तरह नदारद थे। सवालों के बीच निरुत्‍तर चाईं कोहार बगलें झांक रहे थे। उधर, मदनलाल, बल्लू, श्‍यामू, लाल बाबा, गजानंद, बद्री अहीर, अलगू कोहार मंद-मंद मुस्करा रहे थे। चेहरे पर भाव थे कि अब बताओ बेटा, अपने को दिल्ली रिटर्न बताते हो, अब मुंह से बोली काहे नहीं निकल रही। वाकई गजब का सीन था। गॉंव की त्रिमुहानी वाले पीपल के पास हनुमान मंदिर के चबूतरे पर हर बार की तरह इस बार भी निठल्लों की जमात जुटी थी। यहां की बहस संसद सत्र में होने वाली बहसों को मात दे रही थी।

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लक्षलिंग : यहां चढ़ता है एक लाख चावल का दाना

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राजकुमार छत्तीसगढ़ की काशी के नाम से विख्यात लक्ष्मणेश्वर की नगरी खरौद में सावन सोमवार पर श्रद्धालुओं का तांता लगता है। भगवान लक्ष्मणेश्वर के दर्शन के लिए प्रदेश से अनेक जिलों के अलावा दूसरे राज्यों से भी दर्शनार्थी भगवान शिव के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। यहां सावन सोमवार के दिन सुबह से श्रद्धालुओं की लगी कतारें, देर रात तक लगी रहती हैं और भक्तों के हजारों की संख्या में उमड़ने के कारण मेला का स्वरूप निर्मित हो जाता है। भगवान लक्ष्मणेश्वर स्थित 'लक्षलिंग'  में एक लाख चावल चढ़ाया जाता है और श्रद्धालुओं में असीम मान्यता होने से दर्शन करने वालों की संख्या में दिनों-दिन इजाफा होता जा रहा है। प्रत्येक सावन सोमवार में हजारों लोग भगवान लक्ष्मणेश्वर के दर्शन करते हैं और पुण्य लाभ के भागी बनते हैं।

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लोकायुक्‍त : विभागीय जांच के कवच को भेदना होगा!

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इन दिनों देशभर में लोकपाल कानून को बनाये जाने और लोकपाल के दायरे में ऊपर से नीचे तक के सभी स्तर के लोक सेवकों को लाने की बात पर लगातार चर्चा एवं बहस हो रही है. सरकार निचले स्तर के लोक सेवकों को लोकपाल की जॉंच के दायरे से मुक्त रखना चाहती है, जबकि सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि सभी लोक सेवकों को लोकपाल के दायरे में लाना चाहते हैं. ऐसे में लोक सेवकों को वर्तमान में दण्डित करने की व्यवस्था के बारे में भी विचार करने की जरूरत है. इस बात को आम लोगों को समझने की जरूरत है कि लोक सेवकों को अपराध करने पर सजा क्यों नहीं मिलती है.

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बाजार के निशाने पर अब गांव

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सुनील अमरदेश के गॉंव इन दिनों कई तरह से बाजार के फोकस पर हैं। घरेलू उपयोग की वस्तुएं बनाने वाली बड़ी-बड़ी कम्पनियों को अगर वहॉं अपनी बाजारु संभावनाएं दिख रही हैं, तो बिल्कुल शहरी व्यवसाय माने जाने वाले बी.पी.ओ. क्षेत्र ने भी अब गॉवों की तरफ रुख कर लिया है। सरकार अगर देश के प्रत्येक गॉंव में बैंक शाखाएं खोलने की अपनी प्रतिबद्धता जाहिर कर चुकी है तो निजी क्षेत्र की दिग्गज कम्पनी हीरो समूह अब गॉवों में साप्ताहिक किश्त के कर्ज पर  बाइसकिल बेचने का ऐलान कर रही है, और उधर, आई.टी. सेक्टर ने भी घोषणा की है कि गॉंवों के इलेक्ट्रानिकीकरण बगैर देश का त्वरित विकास संभव नहीं है।

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जर्जर रेल पटरियों पर मौत का सफर

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विष्‍णु गुप्‍तएक मात्र रेल दुर्घटना पर तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इस्तीफा दे दिया था। वह काल निश्चिततौर पर नैतिकता का था/समाजसेवा का थी। पद लोलपुपता की जगह जिम्मेदारी लेने और स्वयं को जिम्मेदार मान कर सजा भुगतने के लिए नेता/मंत्री तैयार रहते थे। अनैतिकता के दौर में स्वयं जिम्मेदारी लेने और सजा भुगतने के लिए तैयार रहने की बात या प्रक्रिया चल ही नहीं सकती है। पद पर बने रहने और सत्ता सुख भोगकर अपनी कई पीढियों को आर्थिक कवज बनाने की होड़ में लगे राजनीतिज्ञों/ मंत्रियों /नौकरशाहों से लाल बहादुर शास्त्री जैसी नैतिकता की उम्मीद भी बेमानी है। सत्ता स्वयं भ्रष्ट मंत्रियों/नौकरशाहों को बचाने के लिए कानूनी संरक्षण की पैंतरेबाजी दिखाती है/मनगढंत-प्रत्यारोपित तथ्य पेश कर न्यायालय से ईमानदारी का सर्टिफिकेट हासिल करने में बेशर्मी की सीमा पार करती है।

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ये न्यायिक सक्रियता के प्रमाण हैं या फिर दखलंदाजी

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गिरीश जी: क्या कहती हैं नजीरें : ब्रिटेन में लोकतंत्र का हजार वर्षों का इतिहास है. वहां मानवाधिकारों को लेकर 'मैग्नाकार्टा' घोषणा पत्र 1215 में जारी हुआ था. 1688 में 'ग्लोरियस रिवोल्यूशन'  हुआ, जिसे दुनिया रक्तहीन क्रांति के नाम से जानती है. फिर दुनिया में मध्यवर्गीय क्रांतियों के रूप में 1776 की अमेरिकी क्रांति और 1789 की फ्रांसीसी क्रांति का सूत्रपात हुआ. बाद में बीसवीं सदी में अनेक देशों में समाजवादी क्रांतियां भी हुईं. लेकिन हर आधुनिक व्यवस्था खुद को बेहतर लोकतांत्रिक साबित करने के लिए केंद्रित शक्ति की अवधारणा से हट कर माँटेस्क्यू द्वारा प्रतिपादित 'शक्तियों के पृथक्करण'  को अपने-अपने ढंग से लागू करती रही.

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सलवा-जुडूम, एसपीओ और नक्सलवाद

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pankajसुप्रीम कोर्ट के एसपीओ और सलवा-जुडूम संबंधी आदेशों से फिलहाल छत्तीसगढ़ सरकार की नक्सल विरोधी अभियानों को गंभीर झटका लगा है. अभी दिए अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने जहां सलवा-जुडूम को बंद करने को कहा वहीं नक्सलियों की नाक में दम कर रख देने वाले बहादुर कोया जवानों समेत सभी करीब पांच हज़ार विशेष पुलिस अधिकारियों को हथियारविहीन करने के साथ-साथ केन्द्र को भी यह आदेश दिया है कि वह किसी भी तरह की आर्थिक मदद एसपीओ के मामले में नहीं करे. तो कोर्ट के फैसले पर बिना किसी तरह की टिप्पणी किये ज़रूरी यह समझना है कि आखिरकार इन दोनों मामलों से परेशानी किसे थी?

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मुफ्त की शराब से होगा पुलिस वालों का कल्‍याण!

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4 जुलाई 2011 के कुछ समाचार पत्रों में एक समाचार छपा था जिसे दिल्ली से एजेन्सी के माध्यम से जारी किया गया था। इस समाचार में बताया कि अब केन्द्रीय पुलिस की कैंटीन में भी सेना जैसी व्यवस्था होगी और पुलिस के आला अधिकारियों को याने सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी और एसएसबी के प्रमुख और महानिदेशक को केन्द्रीय पुलिस की कैंटीन से जितनी चाहे उतनी निःशुल्क शराब उपलब्ध होगी। यह निर्णय पुलिस बलों के वेलफेयर एण्ड रिहैबिलेशन बोर्ड की बैठक में लिया गया,  जिसकी अध्यक्षता सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक रमन श्रीवास्तव ने की थी। इस नई कोटा प्रणाली के तहत इन बलों के अन्य अधिकारियों और जूनियर श्रेणी के अधिकारियों के लिये रम, बोदका, बियर आदि पूरे देश में पुलिस कैंटीन के माध्यम से उपलब्ध कराई जायेगी। नए निर्णय के तहत शहीदों के परिजन और सेवा निवृत्त कर्मचारी भी तीन बोतल शराब ले सकते हैं।

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न्‍यायपालिका की गरिमा से खिलवाड़ मत करो

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जगमोहनमैं जज नहीं हूँ. वकील भी नहीं. महज़ पत्रकार हूँ आप ही की तरह. अभी भी सीख ही रहा हूँ तीस साल से. जो सीख पाया हूँ वो ये कि हम न होते तो लोगों में दम न होते. हमारे जैसी न्यापालिका न होती तो हम पे भी रहम न होते. हम सब के सब पता नहीं कब के जे डे हो गए होते. पहले राजनीति शास्त्र, फिर संवैधानिक विधि का छात्र और फिर एक पत्रकार के नाते मैंने पाया है कि हमारे संविधान में इस जैसी न्यायपालिका की परिकल्पना हमारी व्यवस्था के स्थायित्व की एक महत्वपूर्ण शर्त है. हमें इसकी गरिमा बचा ही नहीं, बढ़ा के रखनी चाहिए. अकेले पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने पिछले एक साल में कोई आधा दर्जन जजों को नौकरी से निकाला है तो ज़रूर कुछ कमियाँ होंगी ज़िम्मेवारियों के निर्वहन में. लेकिन यही अपने आप में इसका प्रमाण है कि इस न्याय व्यवस्था में स्वयं अपने परिमार्जन का गुण और क्षमता है.

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अब माओवादी भी लड़ेंगे भ्रष्‍टाचार से!

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संजय द्विवेदीयह कहना कितना आसान है कि माओवादी भी अब भ्रष्टाचार के दानव से लड़ना चाहते हैं। लेकिन यह एक सच है और अपने ताजा बयान में माओवादियों ने सरकार से कहा है कि वह शांति वार्ता (नक्सलियों के साथ) का प्रस्ताव देने से पहले भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के खिलाफ सरेआम कार्रवाई करे। साथ ही विदेशी मुल्कों के बैंकों में जमा सारा काला धन स्वेदश वापस लाए। कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की केंद्रीय समिति के प्रवक्ता अभय ने मीडिया को जारी विज्ञप्ति में कहा है कि सरकार ने प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए औद्योगिक व व्यवसायिक घरानों के साथ लाखों-करोड़ों के समझौते किए हैं। इन्हें रद्द किया जाए। भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को तत्काल रोका जाए। साथ ही सरकार भ्रष्टाचारियों को सरेआम सजा देने की व्यवस्था करे।

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अन्‍ना से सहमत हों या असहमत, भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन जरूरी है

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कौशल किशोरआज अन्ना हजारे और उनके भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन को लेकर कई सवाल उठाये जा रहे हैं। साहित्यकार मुद्राराक्षस ने (जनसंदेश टाइम्स, 4 जुलाई 2011) आरोप लगाया है कि अन्ना भाजपा व राष्ट्रीय सेवक संघ का मुखौटा हैं और अन्ना के रूप में इन्हें 'आसान झंडा'  मिल गया है। जन लोकपाल समिति में ऐसे लोग शामिल हैं, जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। अन्ना हजारे की यह माँग कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में ले आया जाय, संविधान के विरुद्ध है। मुद्राराक्षस ने यहाँ तक सवाल उठाया है कि अन्ना और उनकी सिविल सोसायटी पर संसद और संविधान की अवमानना का मुकदमा क्यों न दर्ज किया जाय?

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बीड़ी मजदूरों की असलियत से नावाकिफ है सरकार

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झारखंड में असंगठित मजदूरों की संख्या लाखों में है। इसमें बीड़ी मजदूरों का एक बड़ा तबका शामिल है। इन मजदूरों का दुर्भाग्य यह है कि उनकी वास्तविक संख्या राज्य सरकार के पास नहीं है। राज्य सरकार बीड़ी उद्योग से जुड़े मजदूरों के हालात से नावाकिफ है। सरकार के पास बीड़ी मजदूरों से संबंधित जो आंकड़े हैं, वह हास्यास्पद है। ऐसे में यह उम्मीद करना कि केंद्र सरकार के पास झारखंड के बीड़ी मजदूरों के संबंध में कोई विशेष जानकारी होगी, बेमानी है। इन परिस्थितियों में राज्य सरकार या केंद्र सरकार द्वारा बीड़ी मजदूरों के लिए बनाई गई योजनाएं कितनी उपयोगी होंगी, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। सूचना अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त आंकड़ों के अनुसार राज्य सरकार के श्रम नियोजन एवं प्रशिक्षण विभाग की नजर में पाकुड़ जिले में मात्र 2589 मजदूर हैं। पर वास्तविकता यह है कि इस जिले में बीड़ी मजदूरों की संख्या 25 हजार से भी अधिक है।

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