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नेता, जेल और अस्‍पताल का खेल

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: गोनू झा कहिन (तीन) : विगत एक हफ्ते से गोनू झा ने गाँव के चौपाल में आ कर बैठना शुरू कर दिया क्यों कि वहां पर उनको सारे पुराने पंच, उनके समर्थक और एक दो मसखरे भी बैठे मिल जाते हैं और फिर कुछ न कुछ बात का बतंगड़ बन ही जाता है. कल शाम कर्नाटक के पूर्व मुख्यामंत्री बीएस यदुरप्पा के जेल जाने पर और रात में अस्पताल लौट आने पर पंचों के बीच में बहस छिड़ गयी और फिर जो तर्क-वितर्क की धारा बह निकली, उसका आनंद कुछ और ही था.

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दुर्दांत कवि जुगाड़ूराम जी सदैव जयते

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हमारे शहर के जुगाडू़ रामजी जन्मजात जुगाड़ू हैं। इस कदर पैदाइशी जुगाड़ू कि मां-बाप के परिवार नियोजन के तमाम संयुक्त प्रयासों को सिंगट्टा दिखाते हुए जुगाड़ू रामजी ने अपने पैदा होने का जुगाड़ लगा ही डाला। जुगाड़ू रामजी की इस दुर्दांत हाहाकारी प्रतिभा से प्रभावित होकर ही पराजित मां-बाप ने इनका नाम जुगाड़ू राम रखा। जैसा नाम वैसा काम। अपनी छोटी-सी जिंदगी में अपनी हैसियत और काबिलियत से ज्यादा बड़ी-बड़ी कामयाबियां जुगाड़ू रामजी ने जुगाड़ के बूते पर ही हथियाकर सभी योग्य सुपात्रों को चकरघन्नी बना दिया है।

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जो शरीफ है वो हर पल पीटने को तैयार रहता है

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विद्वानों का मानना है कि सोना जितना पिटता है उतना ही निखरता है। इससे एक बात तो तय हो ही गई कि कोई उसी को ही पीटता है जिसे वह सोना समझता है। यह किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व या विचार का गैर-राजनैतिक जनमत संग्रह है। वो लोग बहुत दुखी रहते हैं जो कभी पिट नहीं पाते हैं। आहें भरते हैं कि हाय कितनी गहरी उपेक्षा है। कोई इस लायक भी नहीं समझ रहा कि हमें हल्का-सी ही सही मगर कोई पीट तो दे। पद्मश्री तो क्या एक अदद जूता मारने के भी काबिल नहीं समझ रहा ये समाज। कोई प्रायोजक नहीं मिल रहा। इस इवेंट के लिए। बेचारे पिटने का पूरा होमवर्क किए बैठे हैं कि कोई बैल आ मुझे मार। वे घिघियाते हैं कि अंधेरे में जो बैठे हैं, उनकी प्रतिभा को भी पहचानो। उसमें क्या खास है। तभी गहन-गंभीर आकाशवाणी होती है-पिटो तो जानो।

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जिसकी जितनी बड़ी दाढ़ी, वह उतना ही बड़ा दार्शनिक

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कुछ लोगों का मानना है कि दर्शन बड़ा ही टेढ़ा विषय है। और ये सिर्फ टेढ़े लोगों को ही नेचुरली सूट करता है। कुछ लोगों का तो यह भी मानना है कि जितना जो दर्शन में गहरी डुबकी लगाता है उतना ही वो टेढ़ा होकर बाहर निकलता है। जैसे कि मिस्टर अष्टावक्र थे। जितने बड़े दार्शनिक, शरीर से उतने ही ज्यादा टेढ़े भी। हो सकता है दर्शन का शरीर पर ऐसा ही भौतिक-रासायनिक असर होता हो। सुकरात को सीधा करने के लिए सरकार को उसे जहर तक पिलाना पड़ा। मगर वे फिर भी मरते दम तक टेढ़े ही रहे। अब तो मुझे भी यकीन हो गया है कि दर्शन का प्रभाव ही टेढ़ा पड़ता है। विश्वास न हो तो किसी के सामने बस आप दर्शन का नाम भर ले दीजिए। देखिए कैसे उसकी भंवे टेढ़ी होती हैं और फिर क्रमशः उसका मुंह टेढ़ा होता जाता है।

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सचरित्र सड़कों के पथभ्रष्ट पथिक

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सड़कें हमारे भारत की प्राचीनतम ललित कलाओं में एक है इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि इन सड़कों का प्रचलन मोहनजोदड़ो और हड़प्पाकाल में भी खूब खुलकर हुआ करता था। सड़क पर महीन पच्चीकारी की जाती थी ताकि सड़क इतनी चिकनी न हो जाए कि उस पर चलनेवाले फिसल-फिसल जाएं। अगर धोखे से कोई एक-आध सड़क डिफेक्टिव यानी चिकनी बन जाती थी तो राज्य के आदेश से वहां तख्तियां लगा दी जाती थीं- सावधान सड़क चिकनी है। ध्यान दें आगे गड्ढारहित सड़क है। संभलकर चलें। अगर रपट जइयो तो हमें न बुलइयो। ऐसे तमाम खबरदार जुमले जनता को सावधान करने के लिए पूरी मुस्तैदी के साथ चिकनी सड़कों पर लगाए जाते थे। और ऐसी चिकनपट्ट सड़के बनानेवाले अपराधी ठेकेदारों को समारोहपूर्वक मृत्युदंड दे दिया जाता था। गड्ढेदार सड़कें हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं।

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अजीब आदमी हो, हमारे देश में कुल पागलखाना कितने हैं?

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: गोनू झा कहिन (एक) : एक शाम गोनू झा गाँव के तालाब के किनारे बड़ी चिंता में मग्न बैठे थे और किसी से बात ही नहीं कर रहे थे. कोई उनके पास जाता तो वो सामने ज़मीन पर बना हुआ नक्शा दिखा देते और फिर अपनी चिंता में मग्न हो जाते. आखिर गाँव के मुखिया ने ही सवाल पूछ लिया कि वो किस चीज की चिंता में इतने घुले जा रहे हैं. गोनू झा का जवाब था "मैं एक नए जेल का नक्शा और रूप रेखा बना रहा हूँ जो आगरा पागल खाना के बिल्‍कुल करीब हो और वहां पर हर किस्म की सुविधा हो." मगर परेशानी ये है कि इतनी ज़ल्दी सब कैसे होगा? मुखिया जी चौंक गए. बोले "अरे श्रीमान, आप क्यों परेशां है. ये काम तो सरकार का है?"

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कभी नहीं मिलवाऊंगा अमिताभजी को सुरेश नीरव से

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छोटे शहरों के लोगों के लिए बड़े सौभाग्य की बात होती है कौन बनेगा करोड़पति जैसे प्रोग्राम में शरीक होने का। इस नाचीज़ हास्य कवि प्रकाश प्रलय को इत्तेफाक से यह मौका मिला। पूरे उत्साह के साथ अमिताभ बच्चनजी के सामने हॉट सीट पर ऊंट-सी गर्दन उठाकर मैं जा बैठा। अपनी बुद्धि के अनुसार मैंने प्रश्नों के जवाब भी दिए। अंधे के हाथ बटेर लग चुकी थी मतलब कि 25 लाख रुपए तक मैं जीत चुका था। मगर फिर एक सवाल पर मेरी बुद्धि की सुई अटक गई। अमिताभजी ने पूछा कि आप किसी से मदद लेना चाहेंगे। तो मैंने कहा- जी हां..। मैं पंडित सुरेश नीरव से मदद लेना चाहूंगा। उन्होंने पूछा कि आप श्योर हैं कि आपको वो सही समाधान दे पाएंगे।

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महंगाई का बिल नहीं सर्वेंट क्‍वार्टर जितना बड़ा दिल देखो

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आजकल अखबार और खबरिया चैनल खबरों के कम मनोरंजन के केन्द्र ज्यादा बने हुए हैं। राजनेताओं के साफ-सुथरे और पारदर्शी फूहड़पन को जितनी चुस्ती-फुर्ती से ये लोग जन-गण-मन तक पहुंचाते हैं उसका हरेक पाठक को तहेदिल से ही नहीं तहे दिमाग से भी आभारी होना चाहिए। सरकार की संवेदनशीलता और आंकड़ों की योगसाधना से लैस हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था अक्सर ऐसा मंजा हुआ मज़ाक करती रहती है कि भूखे पेटवाले को भी ऐसे मज़ाक याद करके हंसी आ जाती है। बल्कि जब कभी हमारे देश का आम आदमी दुखी होता है तो वह इन सरकारी लतीफों को याद कर-करके फूट-फूटकर हंस लेता है। पूरा बिग बॉस का घर है हमारी सरकार। जहां से चौबीस घंटे लॉफ्टर शो का लाइव टेलीकास्ट चलता रहता है। जोड-तोड़ के लिए प्रतिबद्ध, झूठ बोलने के लिए वचनबद्ध और नाना प्रकार को घोटालों से संबद्ध अपनी सरकार की अभद्र हेकड़ी पर देश की जनता को आदमकद नाज़ है।

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भ्रष्टाचार का भूत और पागलों का पागलपन

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एक पागल पूरे देश में घूम-घूम कर चिल्ला रहा था। भ्रष्टचारी दानव! भ्रष्टाचारी दानव! भ्रष्टाचारी दानव! घूमते-घूमते वह दिल्ली आ गया। दिल्ली में उसने देखा वहां एक से बड़े एक पागल थे। कोई भवन बना रहा है तो बनाता चला जा रहा है। कोई बस चला रहा है तो कोई टिकट काट रहा है, कोई शराब बना बेच रहा है। कोई उसे पी रहा है। जिसके पास कोई काम नहीं है वह सरकार बना रहा है बिगाड़ रहा है। सब लोग एक दूसरे का पॉलागन कर रहे हैं। पागल ने भी कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों को प्रणाम किया। यह सोचकर कि क्या पता यदि इन लोगों को प्रणाम कर लिया जाए तो ये लोग उस बेचारे मानव को पागल कहना छोड़ दें। परंतु परिणाम तो विपरित ही हुआ। वह पागल उन लोगों की आंखों में चढ़ गया जो सरकार बनाते थे और उस सरकार की हिफाजत करते थे।

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योजना आयोग और अमीरों का देश

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भारत अतीत में सोने की चिड़िया हुआ करता था। हमलावरों ने इसे खूब लूटा। हालत इतनी पतली हो गई कि बाल-बच्चों की तो बात क्या इंडिया के राष्ट्रपिता तक लंगोटी में आ गए। लंगोटी भी अपने चरखे के दम पर। फिर वो दिन आया जब ईमानदार शासन, स्वच्छ प्रशासन और योजना आयोग के कठोर अनुशासन की बदौलत देश सोने का कबूतर बन गया। कबूतर इसलिए बना क्योंकि मुश्किल को सामने खड़ा देखकर सिर्फ कबूतर ही आंखें बंद कर सकता है। भारत को ऐसे ही लोटन कबूतर से प्रेरणा मिलती है। इसी की बदौलत भारत फिर आज सोने की लंका नहीं सोने का इंडिया बन गया। फुटपाथ से लेकर बंगलों तक अमीरी ही अमीरी बिखर गई। गरीबी क्या होती है ये जानने आम भारतीय स्विटजरलैंड या अमेरिका-जैसे गरीब मुल्कों में जाने लगे। सन 2011 में तो भारत की अमीरी संपन्नता की कुतुबमीनार पर उछल कर जा बैठी।

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साहब! हम चोरों का भी स्‍टैंडर्ड है, नेताओं के घर चोरी नहीं करते

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नेताजी के यहां चोरी हो गई। शहरभर में तहलका मच गया। कोई पुलिस व्यस्था को कोस रहा था तो कोई चोर की दिलेरी की दाद दे रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि ये मुमकिन हुआ तो हुआ कैसे। कुछ लोग आंख दबाकर इस वाकये पर अपने मुहावरेबाजी के गुप्तज्ञान का खुलासा करते हुए कह रहे थे कि इसे ही कहते हैं-चोर के घर में छिछोर। रिश्वत की सूंघनी सूंघ-सूंघकर उनीदी हुई पुलिस सहसा जाग गई। पुलिस ने अपने परिचित और आत्मीय चोर-उचक्कों को बुलाकर मनुहार करते हुए पूछा- देखो भाई डायन भी सात घर छोड़कर दांव मारती है। तुम लोगों ने तो इतना सौजन्य भी नहीं निभाया। अपने नेताजी के यहां ही हाथ रमा कर दिये। अरे हाथ की सफाई भी करनी हो तो थोड़ा सोच-विचार के काम किया जाता है। बताओ ये किसकी करतूत है।

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मुझे शक है कि मेरी लघु शंका दीर्घ है

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मुझे शक है कि मैं दिन-ब-दिन शक का शौकीन होता जा रहा हूं। पहले शायद ऐसा नहीं था मगर फिर सोचता हूं तो शक होता है कि कहीं ऐसा तो नहीं था कि शक का शौक मुझे बचपन से ही हो और मैंने इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया हो। अब तो हालत यह है कि मुझे शक पर भी शक होने लगा है कि कहीं ये शक हकीकत तो नहीं है। शक का ही दूसरा नाम शंका है। इस शंका का भी कुछ अलग ही खेल है। शंका लघु शंका होती है तो मुझे शक होता है कि कहीं ये शंका दीर्घ शंका तो नहीं है। और मैं उसे लघु शंका ही समझ रहा होऊं। जब कोई आदमी लघु शंका को भी दीर्घ शंका मान बैठे तो शंका में भी इस बात की आशंका रहती है कि इस शंका का समाधान कहां और कैसे होगा। सुलभवाले वैसे तो काफी काम कर रहे हैं मगर फिर भी लघु या दीर्घ शंका के समाधान में आदमी को आत्मनिर्भर ही रहना चाहिए।

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मजबूरी का नाम ईमानदारी : सरकार ने सबकुछ गोपनीय रखा है, स्विसबैंक के खातों की तरह

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पंडित सुरेश नीरवपता नहीं इस देश से भ्रष्टाचार कब जाएगा। बाबा रामदेव से लेकर अन्ना हजारे ही नहीं अब तो हमारे मुसद्दीलाल तक इस समस्या से परेशान हैं। और सरकार है कि जो भी इस मुद्दे के खिलाफ आवाज उठाता है, वह उसे ही भ्रष्टाचारी बताने में लग जाती है। बाबा-तो-बाबा, दूध के धुले बालकिशन तक फर्जी हो गए इस सरकार की नज़र में। बालकिशन की डिग्री नकली। बालकिशन की नागरिकता नकली। चोर कहीं का। चला था देश का कालाधन वापस मंगवाने। सरकार ने बाबा की लंगोटी और बालकिशन की पोल दोनों ही बड़ी विनम्रता के साथ खोल दीं।

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देश सेवा हमारा खानदानी पेशा है

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: अनशन के बाद का प्रलाप : जनता को अपनी औकात में रहना चाहिए। ये सरासर गुंडागर्दी है कि कुछ सड़किए भीड़ जमा करके एक अदद अनशन की दम पर अकड़कर हमें हुक्म दें कि फलां बिल पास करो, फलां विधेयक लाओ और अभी लाओ। किसने दे दिया इन्हें ये अधिकार। अरे इनकी औकात बस इतनी ही है कि ये हमें वोट दें, हमें जिताएं और अगले पांच साल तक हमारे सामने पूंछ हिलाएं। ससुर हम पर ऑर्डर झाड़ेंगे। जनसेवक हम अपने को क्या कह दिए, ये तो हमारे सिर पर चढ़कर ही भांगड़ा करने लगे हैं। अन्ना की औलाद कहीं के। सर पर टोपी लगा ली और कहने लगे कि मैं अन्ना हूं। अरे राजनीति आखिर राजनीति है। कोई बच्चों का खेल नहीं। और अगर बच्चों का खेल है भी तो यह सिर्फ हमारे बच्चों का खेल है। हम लोग दिनभर समाजसेवा में लगे रहते हैं।

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भ्रष्टाचार से लड़ने में कमजोरी बहुत आ जाती है

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भ्रष्टाचार से लड़ने में कमजोरी बहुत आ जाती है। इसीलिए तो हमारे राजनेता भ्रष्टाचार से बच निकलने में ही भलाई समझते हैं और पिछले 64 साल से इससे बचते ही नहीं चले आ रहे हैं बल्कि उससे दोस्ती का रिश्ता बनाकर उसे फलने और खुद के फूलने का मौका निकालते रहे हैं। दोनों में कितना भाईचारा। इस के सूत्र से बंधकर सब-के-सब मौसेरे भाई। आखिर भ्रष्टाचार का विरोध किस मुंह से करें। पूरे चौसठ साल की पक्की दोस्ती। अभी-अभी एक अंग्रजीदां बबुआ ने तो पूरे बारह दिन लगाए भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने और मुंह खोलने में। रोज़ रियाज़ करके भी बेचारे अपना पाठ जब याद नहीं कर पाए तो जिसने लिखा था उसीके पन्ने को उठाकर पढ़ गए। क्या पढ़ा इसका उन्हें तो क्या पूरे देश को कोई मतलब समझ में नहीं आया। हां इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ को पढ़ते-पढ़ते कहीं बबुआ चक्कर ना खा जाएं इसलिए मदद के लिए उनके बलसखाओं की मंडली-तो- मंडली खुद बहनिया भी मोर्चे पर तैनात रहीं।

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सरकार बड़ी निकम्‍मी है, न अन्‍ना को सेट कर पाई न पैसे को

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भ्रष्टाचार प्रधान हमारा देश आजकल अन्ना प्रधान देश हो गया है। गूंगे भी अन्ना की प्रशंसा में धाराप्रवाह बोल रहे हैं। धाराप्रवाह बकवास में माहिर नेता गैस पर रखे कुकर में उछलते आलूओं की तरह अन्ना के समर्थन में भ्रष्टाचार को कोसने की प्रतियोगिता में वीरता चक्र हासिल करने पर आमादा हैं। और-तो-और भिखारियों की मंडली में भी फीलगुड की भावनाएं हिलोरें मारने लगी हैं। फुटपाथ पर बैठकर भीख मांगने और रात में सोने तक के लिए पुलिसवालों को पैसे देने पड़ते थे। जिन्हें बैठकर भीख मांगने के लिए ठीया नसीब नहीं था उन्हें जनगणना की ड्यूटी पर लगे सरकारी मास्टरों की तरह घर-घर जाकर भीख मांगनी पड़ती थी। वे भी इस गोल्डन सप्ताह में ठप्पे से रामलीला मैदान जाकर दो टाइम भरपेट इज्जत की रोटी तो क्या तबीयत से तरह-तरह के माल उड़ा रहे हैं।

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