Monday, 06 September 2010 18:51
अभिषेक शर्मा
: बबलू मल्लाह के एनकाउंटर के बाद भी नहीं आई शांति : अपहरण की घटनाओं से घबराए बीहड़वासी : 27 अगस्त 2010 की सुबह पांच बजे मेरा मोबाइल बजा पहली बार फोन कट गया, फिर दुबारा घंटी बजी तो मैंने उठाया और उठाते ही कान में आवाज पड़ी, 'गुड मार्निंग अभिषेक सो रहे हो क्या?' आवाज औरैया एसपी सुभाष दुबे की थी। मुझे आभास हो गया कि कोई गुडवर्क की ही खबर होगी। नही तो इतनी सुबह कप्तान साहब शिकायत करने के लिए तो कॉल नहीं करेंगे। अपनी निंद्रा भंग करते हुए मैंने जवाब दिया, 'गुड मार्निंग सर, सो नहीं रहा था, ब्रश करने जा रहा था। क्या हुआ सुबह-सुबह ही?' उधर से जवाब आया, 'अरे हमने एक डकैत का एनकाउंटर किया है।' हां, मुझे पता था, औरैया पुलिस डकैत बबलू मल्लाह की तलाश में राखी के दिन से ही लगी थी। रात में ही अस्ता के खूंखार जंगलों में यमुना के किनारे बबलू अपने एक साथी के साथ मार डाला गया था। मैने भी कप्तान साहब को बधाई दी और ब्रश करने के बाद खबर ब्रेक करवाने के साथ ही दो मग से कौवा स्नान करके घटनास्थल की ओर रवाना हो गया।
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Monday, 06 September 2010 17:14
चन्द्रभान सिंह ‘त्यागी‘
: जहानाबाद में प्रिंट रेट से अधिक दाम पर की जा रही है शराब की बिक्री : मदिरा के साथ माफिया और उसकी मनमानी देखनी है तो जहानाबाद जनपद से अच्छी जगह दूसरी शायद ही मिल सकेगी। एक तो शराब के शौकीनों को समाज भी अच्छी निगाह से नहीं देखता, दूसरे उनकी जेब में डाले जा रहे डाके पर सरकार और शासन की भी निगाह नहीं पहुंच पा रही है। फलस्वरूप पौव्वा पर अंकित मूल्य से 5, अद्धा में 10 और बोतल में 20 रूपये अधिक कीमत की वसूली पूरे जनपद में धड़ल्ले से जारी है। सरकार को जनपद से आबकारी द्वारा प्राप्त होने वाले राजस्व के सापेक्ष लगभग 15 प्रतिशत की काली कमाई इन शराब की दुकानों से की जा रही है। आबकारी विभाग की भी, इस धंधे मे जमे माफियाओं की मदिरालयों में मनमानी पूर्ण बिक्री से होने वाली आय में, हिस्सेदारी से इनकार नहीं किया जा सकता है।
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Monday, 06 September 2010 16:33
रिजवान चंचल
: सामर्थ्यवान को छूट, छोटों को बंदरघुड़की क्यों :आखिर क्यों सारे नियम-कानून लघु समाचार पत्रों के प्रकाशकों व सम्पादकों से ही आरएनआई और डीएवीपी फालो कराना चाहता है? बड़ों को छूट और छोटों को आये दिन बंदर घुड़की क्यों? प्रेस रजिस्ट्रार द्वारा समाचार पत्र के मत्थे पर अखबार के नाम के अलावा कुछ भी लिखे जाने के मामले में लगातार दोहरी नीति अपनाई जा रही है। बड़े समाचार पत्र मत्थे पर सब कुछ लिखते हैं, उन्हें तो आरएनआई के अधिकारी रोकते नहीं और लघु एवं मध्यम तथा भाषाई समाचार पत्र यदि शीर्षक के अलावा कुछ मत्थे पर छापते हैं तो उन्हें परेशान किया जाता है, उन्हें रजिस्ट्रेशन नम्बर ही नही दिया जाता, और तो और छोटे पत्रों से सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग वालों को भी तमाम तकलीफ है। ये सम्पादक का कार्ड ही जल्दी नही बनाते, मनमाना कानून बता कर टहला देना, इन सबकी दिनचर्या बन चुकी है।
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Monday, 06 September 2010 15:48
कृष्ण प्रताप सिंह
: कई अखबारों के पत्रकार निष्पक्षता छोड़ कारसेवक पत्रकार बन गए थे : यह एक संयोग (कायदे से दुर्योग) ही था कि उधर विश्वहिन्दू परिषद ने अयोध्या को रणक्षेत्र में बदलने के लिए दाँत किटकिटाए और इधर मेरे भीतरसोये नन्हें पत्रकार ने आँखें मलनी शुरू की. जिस फैजाबाद जिले में अयोध्या स्थित है, उसके पूर्वांचल के एक अत्यन्त पिछड़े हुए गाँव से बेहद गरीब बाप के दिये नैतिक व सामाजिक मूल्यों की गठरी सिर पर धरकर यह पत्रकार चला तो उसका सामना विश्वहिन्दू परिषद द्वारा दाऊ दयाल खन्ना के नेतृत्त्व में सीतामढ़ी से निकाली जा रही रथयात्रा से हुआ ‘आगे बढ़ो जोर से बोलो, जन्म भूमि का ताला खोलो’ जैसे नारे लगाती आती यह यात्रा अन्ततः आम लोगों द्वारा अनसुनी के बीच, तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी की हत्या से उफना उठे सहानुभूति के समन्दर में डूब गयी थी. और डूबती भी क्यों नहीं, श्रीमती गाँधी ने अपने प्रधानमंत्री रहते इसकी बाबत कोई टिप्पणी तक नहीं की. उन्हें मालूम था कि उनकी टिप्पणी से व्यर्थ ही इस यात्रा का भाव बढ़ जायेगा. संघ परिवार इससे अति की हदतक निराश हुआ.
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Monday, 06 September 2010 14:26
रविन्द्र सिंह
: उल्टा फहराया गया देश का झंडा : सीमा पार पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के लाहौर में बाढ़ पीडि़तों के सहायतार्थ भारत से गया बुद्धिजीवी वर्ग का एक दल तिरंगे का अपमान कर आया। खबर तब सुर्खियों में आई जब दल के सदस्यों की उलटा तिरंगा थामे तस्वीर अंग्रेजी के समाचार पत्र हिंदुस्तान टाइम्स के हरियाणा पृष्ठ पर तीन सितंबर के अंक में छपी। इंडो-पाक शांति कारवां के नाम पर अमन के १० पैरोकार सीमा पार बाढ़ पीडि़तों की मदद के लिए गए थे। यह दल मैगसेसे अवार्ड विजेता संदीप पांडे की अगुवाई में पाकिस्तान गया था। जिसमें गुरदयाल सिंह शीतल व दर्शन सिंह पंजाब से, जायद अहमद शेख गुजरात से, कॉनफेडरेशन ऑफ वॉलेंटरी एसोसीएशन (कोवा) हैदराबाद से मजहर हुसैन, फिरोज हुड्डा लखनऊ से, राजेश्वर दिल्ली से, फिरोज मिट्ठीबोरवाला व मोनिका वाही मुंबई से तथा रमनीक मोहन हरियाणा भी भारत से पाकिस्तान गए थे।
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Monday, 06 September 2010 14:15
डा.प्रवीण तिवारी
: आतंकवादियों का मोहरा बन चुका मीडिया अब नक्सलियों के इशारे पर नाच रहा है : 26/11 की रिपोर्टिंग में किरकिरी करवा चुके हमारे भाई लोग अब भी ग़लतियों से सबक लेने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में नीतीश कुमार जी जैसे नेताओं को मीडिया का मज़ाक उड़ाने का मौक़ा मिल जाता है और वो हमें सचमुच का ‘पीपली लाइव’ कहने से नहीं चूकते। नक्सलवाद से निपटने की कोशिशों में झटका खाने वाले नीतीश को ऐसी गंभीर परिस्थितियों में कटाक्ष करने का और मीडिया पर टीका टिप्पणी करने का मौक़ा भी तो भाई लोग ही दे रहे हैं। पहले आतंकियों का मोहरा बन चुका भारतीय मीडिया अब नक्सलियों के इशारों पर नाच रहा है। ख़बरों के कारोबार में स्त्रोत महत्वपूर्ण होता है और बिना तस्दीक के कोई ख़बर चलाना ग़ैरज़िम्मेदाराना माना जाता है। इस कारोबार का ये बेसिक सब जानते है, इसके बावजूद नक्सलियों के कथित प्रवक्ता से फोन पर बात कर-करके ख़बरे चलाने वाले चैनल्स और अख़बार क्या बेसिक्स भूल गए हैं?
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Saturday, 04 September 2010 18:33
राजीव यादव
: संवेदनशीलता के मामले में हमेशा कमजोर दिखा है यह अखबार : दैनिक जागरण ने 31 अगस्त 2010 को अपने संपादकीय ‘अति सर्तकता’ में ‘चिंता’ जताई है कि बाबरी मस्जिद पर जैसे-जैसे फैसला आने का समय नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे प्रदेश में प्रशासनिक स्तर पर सक्रियता क्यों बढ़ाई जा रही है? यहां यह सवाल उठता है कि 92 की बजरंगी करतूतों से डरा हुआ समाज, जब फिर से संघ गिरोह द्वारा खुलेआम इस धमकी से, 'यदि फैसला उनके खिलाफ जाता है तो फिर से सड़क पर उतरेंगे' से डरा हुआ है और उसके मन में 92 की घटना फिर से जिंदा हो उठी है। ऐसे में हर अमन पंसद नागरिक इस बार एक चौकस व्यवस्था चाहता है। तब देश के सबसे ज्यादा लोगों के बीच पढ़ा जाने वाला अखबार बहुसंख्यक जनता की इस चिंता को क्यों नजरंदाज कर रहा है। दैनिक जागरण को आम लोगों की तरह यह क्यों नहीं लगता कि अगर 92 में तत्कालीन कल्याण सरकार ने चाक चौबंध व्यवस्था की होती, तो बाबरी मस्जिद के विध्वंस जैसी बड़ी घटना नहीं हो पाती और ना ही इतने लोग मारे गए होते।
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Saturday, 04 September 2010 17:29
माणिक
: चित्तौड़गढ़ के सांस्कृतिक कर्मी माणिक ने पद्मश्री पंडित विश्व मोहन भट्ट से बातचीत की. यह बातचीत उस समय हुई जब पंडित जी एक कार्यक्रम के सिलसिले में चित्तौड़ आए हुए थे. पंडित जी ने भारत में शास्त्रीय संगीत की दशा-दुर्दशा पर खुलकर बातचीत की. प्रस्तुत हैं कुछ अंश- एडिटर
: देश में संगीत की दुर्दशा से आहत हैं पंडित भट्ट : हिन्दुस्तान में पिछले पांच हजार सालों से चली आ रही मुनियों की संस्कृति में हमारी संगीत परम्परा का बहुत बड़ा प्रभाव रहा है। मगर सरकारी उदासीनता के चलते आज टीवी चैनलों की भरमार में शास्त्रीय संगीत से जुड़ा एक भी चैनल नही है। दूसरी तरफ हमारी आज की युवा पीढी तेज दिमाग वाली है, मगर उसकी योग्यता को उचित दिशा देने वाली शिक्षा व्यवस्था में संगीत जैसा संवेदनशील विषय चौथे-पांचवे दर्जे पर आता है। हम अपने बच्चों पर बहुत सारी ऐसी चीजें थोप रहे हैं, जो कि उन्हें पसंद भी नहीं रहे हैं. ये विचार विश्वभर के लगभग 41 देशों में अपने कार्यक्रम दे चुके पद्मश्री विश्व मोहन भट्ट ने स्पिक मैके के लिए राजस्थान दौरे पर आने पर चित्तौडगढ में व्यक्त की.
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Saturday, 04 September 2010 13:19
राजीव यादव
: उत्तर प्रदेश और दिल्ली के जनमाध्यमों की होगी मानिटरिंग : जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी ने निर्णय लिया है कि अयोध्या मसले पर आ रहे न्यायालय के फैसले पर खबरों की मानिटरिंग की जाएगी। पिछले दिनों से जैसे-जैसे फैसले की तारीख नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे प्रायोजित रुप से सांप्रदायिक खबरों को परोसने की कवायद तेज हो गयी है। खबरों की यह मानिटरिंग मुख्य रुप से उत्तर प्रदेश और दिल्ली के जनमाध्यमों की होगी। जेयूसीएस ने मीडियाकर्मियों से अपील की है कि इस दौरान वे खबरों को प्रसारित करते समय विशेष सतर्कता बरतें। सूत्रों से जुड़ी खबरों को प्रसारित करते समय संस्थान खबर देने वाले व्यक्ति की बाई लाइन लगाएं। जिससे यह शिनाख्त आसान हो जाए कि खबर कहां से दी जा रही है या लायी जा रही है।
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